Thursday, September 18, 2008

मोनिका के चालीस प्रेम पत्र-एक


विनोद मुसान
अपने
अच्छे दिनों में मोनिका ने जब अपने प्रेमी अबू सलेम को प्रेम पत्र लिखे होंगे, तब शायद उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उसके इन प्रेम पत्रों को भरे बाजार में उछाल कर उसे रुसवा किया जाएगा। आमतौर पर प्यार में चोट खाए प्रेमी द्वारा ही ऐसा किया जाता है। लेकिन, यहां तो कहानी ही दूसरी है। इस बार मोनिका केदिल पर दाग उसके प्रेमी ने नहीं बल्कि एक न्यूज चैनल ने लगाए हैं। भद् दे अंदाज में मोनिका के प्रेम पत्रों की प्रस्तुति देखने के बाद मन में एक टीस सी उठी और दिल ने कहाऱ्यूं रुसवा करो किसी के टूटे दिल को बाजार में, पाती प्रेम की लिखी थी उसने किसी के प्यार में, अब उसका सि का ही खोटा निकला, तो या यूं ही फेंक दोगे उसे भरे बाजार में। ...और फिर यह हक 'आपको` किसने दिया कि किसी के निजी प्रेम पत्रों को यूं बाजार में नीलाम करो। मोनिका और उसका प्रेमी अगर गुनाहगार हैं तो उन्हेंे सजा देने का अधिकार आपको किसने दिया। एक न्यूज चैनल के हाथ लगे मोनिका द्वारा अबु सलेम को लिखे चालीस प्रेम पत्रों का चैनल द्वारा कुछ इस तरह प्रस्तुतिकरण किया जा रहा है, जैसे इस बार उसने शताब्दी की सबसे महानत्म खोज कर डाली हो।
..............एक बानगी देखिए
-कहने को न्यूज चैनल और न्यूज की शुरूआत कुछ इस अंदाज में की जाती है, जैसे अब अगले आधे घंटे तक मदारी का खेल दिखाया जाने वाला हो। -टीवी स्क्रीन पर मोनिका की हैंडराइटिंग में पत्रों को दिखाया जा रहा है, जिसकी एक-एक लाइन दर्शक बड़ी आसानी से पड़ सकते हैं। -साथ में सुनाई देती है एंकर की भद् दी सी आवाज। आवाज में कुछ इस तरह की शरारत, जैसे स्क्रीन पर किसी वेश्या द्वारा खुलेआम अंग प्रदर्शन किया जा रहा हो। -एंकर द्वारा प्रेम पत्रों में लिखी एक -एक लाइन को कुछ इस अंदाज में पड़कर सुनाया जाता है जैसे रॉ के किसी अधिकारी के हाथ आईएसआई का खुफिया पत्र लग गया हो। ऱ्यहां तक तो ठीक था, लेकिन जब न्यूज एंकर प्रेम पत्रों में लिखी कुछ ऐसी बातों को प्रस्तुत करता है (जिनको यहां पर लिखना भी शायद अनुचित हो) जो नहीं करनी चाहिए तो दुख होता है यह सोच कर कि पत्रकारिता के नाम पर टीवी चैनलों में ये या बेचा जा रहा है।
क्रमश
: .....

मोनिका के चालीस प्रेम पत्र-दो


विनोद मुसान
इसके बाद मन में सवाल उठता है आप किसी की निजी बातों को उत्पाद कैसे बना सकते हो? मोनिका ने एक अपराध किया था, जिसकी उसने सजा भी भुगत ली। प्यार करना कौन सा अपराध है। यहां तक कि किसी अपराधी को भी आप प्यार करने से नहीं रोक सकते। मोनिका द्वारा डॉन के नाम से मशहूर अबु सलेम को लिखे गए चालीस प्रेम पत्र उसकी निजी संपत्ति हैं। यह बात और है कि वह आज एक टीवी चैनल के हाथ लग गए। मोनिका के जीवन का चढ़ता सूरज जब सातवें आसमान पर था, तब वह एक गलती कर बैठी और उसे एक अनजाने शख्स से प्यार हो गया। बाद में पता चला कि वह अनजाना शख्स कोई और नहीं बल्कि 'डॉन` है। मोनिका ने गलती की और उसकी सजा भी भुगती और आज भी भुगत रही है। उसके शब्दों में ''आज मेरे पास रहने को एक मकान भी नहीं है, लोग मुझसे डरते हैं। मुझसे अनजाने में कुछ बड़ी गलतियां हो गई, जिन्हें मैं अब ठीक करना चाहती हूं। मैं समाज में फिर से खड़ा होना चाहती हूं, मैं लोगों को बताना चाहती हूं कि मोनिका वैसी नहीं है, जैसा मीडिया में उसे प्रस्तुत किया जाता है।`` खैर मोनिका द्वारा 'बिग बॉस` के घर में कही गई इन बातों इतना तो स्पष्ट हो जाता है, घर का भूला एक बार फिर घर लौटना चाहता है, लेकिन उसकी इस कोशिश में हर बार उसका अतीत उसकेसामने खड़ा हो जाता है। वैसे मैं यहां पर स्पष्ट कर देना चाहता हूं, कि मुझे मोनिका से कोई हमदर्दी नहीं है। मैं भी उसको उतना ही जानता हूं, जितना एक सैलिब्रिटी के बारे में आम लोग जानते हैं। लेकिन पत्रकार होने केनाते नजरे हर व त कुछ न कुछ ढूंढती रहती हैं। इस बार मोनिका के चालीस पत्र सामने आ गए। हर बार मोनिका जब अदालत में पेशी के लिए कैदी वाहन से उतरती थी, मीडिया केकैमरे उसे कैद कर लेते थे। अखबार के दफ्तरों में अकसर उसकी भोली सी सूरत और हर बार नये सूट की चर्चा जरूर होती रही है। लगता था इस रहस्यमय चेहरे के पीछे बहुत कुछ है, जो दुनिया के सामने नहीं आया। व त गुजरा और मोनिका को अदालत ने कुछ हिदायतों के साथ बरी कर दिया। इसके बाद उसकेबारे में खूब छपा, टीवी वालों ने भी खूब मसाला बटोरा। इसके बाद कुछ व त गुजरा और फिर सब सामान्य सा हो गया। लेकिन इस बार बिग बॉस के घर में मोनिका दर्शकों से रू-ब-रू थी। पहले हफ्ते में उसकी चुप्पी ने साधगी का दामन थामे रखा। लेकिन जैसे-जैसे मोनिका ने बोलना शुरू किया, उसके व्यि तत्व का झोल खुलकर सामने आया। इसके बाद लगा कबाब में कंकड़ हैं। तस्वीर उतनी साफ नहीं है, जितनी दिखाई देती है। हमदर्दी बटोरना एक बात है, लेकिन उसे कायम रखने के लिए एि टंग की नहीं एक परिप व व्यि तत्व की जरूरत होती है, जिसमें शायद मोनिका मात खा गई। आगे उसका जीवन किस ओर माे़ड लेगा, यह भी मोनिका का व्यि तगत मामला है, लेकिन मोनिका की जिंदगी को उसकी मर्जी के बगैर जिस तरह से दूसरे लोग उत्पाद बनाकर बाजार में बेच रहे हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए।
पत्रकारिता के इस बिगड़ते स्वरूप पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

Monday, September 15, 2008

हिन्दीं हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा

विनोद मुसान
जिस तरह एकता कपूर नहीं जानती कि वह महिलाआें को केंद्रबिंदु बनाकर एक के बाद एक धारावाहिक बनाकर उनका कितना बुरा कर रही हैं, ठीक उसी तरह वर्तमान पीढ़ी के पत्रकार हिन्दी को किस गर्त में ले जा रहे हैं, वह भी नहीं जानते। पत्रकारिता का नया स्वरूप, जिसे अब ट्रैंड कहा जाता है, हिन्दी को प्रतिदिन दयनीय स्थिति में पहुंचा रहा है। समय की मांग और आम बोलचाल की भाषा में अंग्रेजी की घुसपैठ के नाम पर आज अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी में पढ़ाया जा रहा है। इसे अपमान नहीं तो या कहेंगे? हिन्दी शब्दकोष का खजाना इतना बड़ा है कि हर शब्द की अभिव्यि त केलिए हिन्दी में एक नहीं चार-चार शब्द मौजूद हैं। लेकिन आजकल पत्रकार अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी में गोल-मोल कर ऐसे पेश करते हैं, जैसे अगर इन शब्दों को वाकई में हिन्दी में लिख दिया गया तो अनर्थ हो जाएगा। अंग्रेजी कोई बुरी भाषा नहीं है, हमें इसे भी जानना चाहिए। आखिर यही एक भाषा (अंग्रेजी) है जिसके जरिए हम अंतरराष्ट ्रीय वार्तालाप कर सकते हैं।
ऐसा नहीं है कि हिन्दी का बे़डागरक करने में केवल पत्रकारों या हिन्दी सामाचार पत्रों का ही हाथ है। नेता से लेकर अभिनेता तक, अध्यापक से लेकर अधिकारी तक रोज हिन्दी का कत्ल करते हैं। यहां पर मैं खासकर पत्रकारों की बात इसलिए कर रहा हूं, योंकि मैं भी इसी बिरादरी से जु़डा एक जीव हूं। सामाचार पत्र समाज का आईना होता है। हम, रोज सवेरे पाठकों के सम्मुख जो प्रस्तुत करते हैं, उसे आमतौर पर पत्थर की लकीर मान लिया जाता है। ऐसे मैं जब हम अंग्रेजी के 'शब्द विशेष` को रोज हिन्दी में लिखकर पाठकों को पढ़ाते हैं, तो इसका एक चलन सा निकल पड़ता है। इसके बाद अध्यापक-टीचर, प्र्राचार्य-प्रिंसिपल, विद्यार्थी-स्टूडेंट, कक्षाएं- लास, महाविद्यालय-कालेज, विश्वविद्यालयऱ्यूनिवर्सिटी, बाजार-मार्केट, विज्ञान-साइंस, प्रौद्योगिकी-टे नोलॉजी, कुर्सी-चेयर, मेज-टेबल, समाचार पत्र-न्यूज पेपर, सरकार-गवर्नमेंट, योजना-स्कीम, परियोजना-प्रोजे ट बन जाता है।
ऐसे में यदि किसी पत्रकार भाई से पूछा जाता है कि भाई यों इतना अंग्रेजी केशब्दों का प्रयोग करते हो। तर्क होता है, ''लोकल रीडरस की भावनाआें को ध्यान में रखना पड़ता है और अब तो यही ट्रेंड चल रहा है। आज इसका यूज नहीं करोगे तो पीछे छूट जाओगे। अब तो आम बोलचाल की भाषा में भी बिना अंगे्रजी के घालमेल किए काम ही नहीं चलता। ...और फिर हम कौन सा हिन्दी के ठेकेदार बैठे हैं, अपन को तो बस नौकरी करनी है। चलने दो जैसा चल रहा है।``
चलो मान लिया अब आम बोलचाल की भाषा में बिना अंग्रेजी के काम नहीं चलता, लेकिन लेखनी में हम यों अंग्रेजी का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। यों नहीं हम हिन्दी को हिन्दी में लिखते। वैसे भी २१वीं सदी में आते-आते हिन्दी अपना मूल स्वरूप तो खो ही चुकी है और हिन्दी की जननी संस्कृत भाषा तो लगभग लुप्तप्राय सी हो गई है। ऐसे में या हमें चिंता नहीं करनी चाहिए कि हम इसके बचे-खुचे स्वरूप को बचाए रखें। हम पत्रकारिता करते हैं और हिन्दी में पत्रकारिता करते हैं। हिन्दी मतलब हिन्दी। इसको बचाना हमारा धर्म भी है और कर्त्यव्य भी। आखिर इसी हिन्दी ने हमें रोजी भी दी है। मैं कहना चाहूंगा, हिन्दी के साथ अंग्रेजी का घालमेल करने वाले उन हिन्दी पत्रकारों से 'दोस्तों हिन्दी को जानो-पहचानों, इससे प्यार करो और इसका विस्तार करो, बताने की जरूरत नहीं है कि यह हमारी राष्ट ्रीय भाषा है। इसमें मिठास भी है और उल्लास भी। फिर यों हिन्दी केसाथ अंग्रेजी की खिचड़ी पकाते हो।
गर्व से कहो -
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलिस्तां हमारा
हिन्दी हैं हम हिन्दी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा।
हां चलते-चलते बात वहीं खत्म करना चाहूंगा, जहां से मैंने शुरू की थी। शुरू में जिक्र आया था एकता कपूर का। या आपको नहीं लगता, घरों में लड़ाई-झगड़े और साजिश करने के जितने नुख्शे एकता कपूर ने औरतों को सिखा दिए हैं, वे कम नहीं है। कोई अगर एकता कपूर से पूछे तुमने इस समाज को या दिया है। तो शायद वह यह कहने में भी गुरेज न करे कि मैंने नारी का असली चेहरा परदे पर ला दिया। योंकि एकता जो कुछ अपनी धारावाहिकों में दिखाती है, उसके लिए वही सच्चाई है।

Saturday, September 13, 2008

इस परंपरा को आगे बढ़ाएं

विनोद मुसान
उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गांवों में आज भी एक परंपरा जीवित है। जिसका अनुसरण करने पर काफी हद तक बिगड़ते पर्यावरण को बचाया जा सकता है। आमतौर पर हम अपने अहम पलों को यादगार बनाने के लिए कुछ ऐसा कराना चाहते हैं, जिसकी अमिट छाप हमेशा बनी रहे। ऐसा ही एक उदाहरण इस राज्य के कई गांवों में आज भी देखने को मिलता है। यहां जब भी किसी घर से शादी के बाद लड़की विदा होती है तो तमाम रस्मों के बाद वर-वधु के हाथ से विदाई से पूर्व एक अंतिम रस्म निभाई जाती है। इसके तहत वर-वधु को घर के आंगन में एक फलदार पौधा लगाना होता है। जो उनके पवित्र बंधन का प्रतीक और उस घर की खुशहाली का आशीर्वाद स्वरूप माना जाता है, जिस घर से लड़की विदा होती है। परंपरा के अनुसार इस व त बेटी भगवान से प्रार्थना करती है कि आज मैं इस घर से विदा हो रही हूं, लेकिन इस फलदार वृक्ष के रूप में मेरी शुभकामनाएं हमेशा मेरे बंधुवरों से जु़डी रहेंगी।
इस प्रथा की शुरुआत की थी चमोली जिले के एक शिक्षक कल्याण सिंह ने, जिसे उन्होंने मैती आंदोलन का नाम दिया। आंदोलन को आगे बढ़ाने में पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, चं़ढीप्रसाद भट् ट और चिपको आंदोलन की प्रमुख नेत्री गौरा देवी ने अहम भूमिका निभाई।
बात अगर बिगड़ते पर्यावरण की हो तो फिर हम अपने गांव, शहर और देश की ही बाते यों करें, यह समस्या पूरे विश्व की है। बिगड़ते पर्यावरण के कारण आज धरती पर जीवन का अस्तित्व खतरे में हैं। विश्वभर में एक दिन में जितनी शादियां होती हैं, उतने ही वृक्ष अगर एक दिन में इस धरती पर रोपे जाएं तो निश्चिय ही इसके सुखद परिणाम सामने आ सकते हैं। फिर शादी ही यों इस पहल को हम और आगे बढ़ा सकते हैं। शादी की सालगिराह, बच्चे को जन्मदिन, होली-दिवाली और तमाम ऐसे अवसर जिन्हें हम खास बनाने के लिए एक पल में हजारों रुपए हंसते-हंसते उठा देते हैं। ऐसे मौको पर हमारे द्वारा किए गए फिजूल खर्च हमें कुछ पल की खुशी तो देते हैं, लेकिन वास्वतिकता में इसके बाद हमारा हाथ खाली ही रहता है। योंकि ऐसा करकेहम सिर्फ गंवाते है, सृजन नहीं करते। जबकि इन पलों को खास बनाते हुए अगर हम धरती पर एकपौधा रोपते हैं, तो भविष्य में इसके सुखद परिणाम आना निश्चित है।
इस बारे में गढ़वाल विश्वविद्यालय में कार्यरत प्रो. डीआर पुरोहित कहते हैं कि इस आंदोलन को वह अंतरराष्ट ्रीय फेम नहीं मिल पाया, जिसकी इसको दरकार थी। सुखद होता अगर सरकार ने भी इस दिशा में थाे़डा प्रयास किया होता। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया। प्रो. पुरोहित आगे कहते हैं अभी भी देर नहीं हुई है, अगर हम ठान ने तो शुरूआत तो आज भी हो सकती है। ...और फिर यह धरती पराई तो नहीं, धरती हमारी मां है। हर संतान का कर्त्यव्य बनता है कि वह अपनी मां के जख्मों पर मरहम लगाए।

Sunday, August 31, 2008

रामजी भाई की परेशानी

विनोद मुसान
गत दिनों मचे सियासी घमासान के बाद रामजी भाई 'गांव वाले` बड़े हैरान-परेशान हैं। उनकी परेशानी का सबब सियासत के अखाड़े में हो रही उठापठक नहीं है। वे इस बात से भी परेशान नहीं हैं कि राजनीति के इस खेल के खिलाड़ी किस कदर मर्यादा को ताक पर रख एक पाले से दूसरे पाले में जा रहे हैं। ...और जहां तक 'नोटतंत्र` (संप्रग सरकार की ताजा उपलब्धि) की बात है, इसे भी वे इतना बुरा नहीं मानते। उनके अनुसार ये विधा तो इस खेल में पूर्व से प्रचलित थी। फर्क सिर्फ इतना है, पहले ये खेल परदे के पीछे खेला जाता था, लेकिन अब टीवी कैमरों की टीआरपी ने इसे दर्शक उपलब्ध करा दिए। रामजी भाई की समस्या इससे भी ज्यादा 'टेि नकल` और देशकाल के साथ खुद उनके भविष्य से जु़डी है।
आप सोच रहे होंगे ये रामजी भाई हैं तो 'गांव वाले` और इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। आखिर ये हैं किस खेत की मूली? तो चलो रामजी भाई की समस्या से पहले उनका संक्षिप्त परिचय ही करा दिया जाए। दरअसल, रामजी भाई गांव के पढ़े-लिखे वे नौजवान हैं, जिन्हें आप और हमारी तरह ही देश के भविष्य की चिंता सताती रहती है। लेकिन, ग्रामीण पृष्ठ भूमि से जु़डे होने के चलते लोग उनकी बातों को उतनी तबज्जो नहीं देते, जितनी उनके अनुसार उन्हें मिलनी चाहिए। ये उनकी दूसरी समस्या है।
अब बात करते हैं मुद् दे की। करार के मुद् दे पर 'हाथ` और 'लाल झंडे` की बीच हुई तकरार आखिर उस माे़ड पर आ पहुंची, जहां बैटिंग कर रहा हाथ आउट होते-होते बचा। इसके बाद तो जैसे लाल झंडे का रंग और सुर्ख हो गया। उसने नया शगूफा छाे़डा और केंद्रीय दरबार की गद् दी में 'गजराज` को बैठाने की बात कह डाली। बड़े-बडे दिग्गजों के कान खड़े हो गए। उन्हें ताउम्र सियासत के खेल का अनुभव छोटा लगने लगा। उनके दिन का चैन और रातों की नींद उड़ गई। ऐसे में हमारे रामजी भाई 'गांव वाले` का परेशान होना भी लाजमी था। आखिर लोकतांत्रिक देश में चिंतन करने का उनका भी हक है। यह बात दीगर है कि इस देश के लाखों-कराे़डों पढ़े-लिखे अन्य नौजवानों की तरह रामजी भाई भी सिर्फ 'सोचकर` ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देते हैं। वे चाहते हुए भी कुछ ऐसा नहीं कर पाते कि 'मायाजाल` में उलझने के बजाए उससे बाहर निकलकर दूसरों के सामने ऐसी युि त पेश करें, जिससे वे खुद की की नैय्या और साथ बैठे दूसरे सहयात्रियों को भी पार लगा सकें।
चलते-चलते बताता चलूं कि सियासतदांजी में पैनी नजर रखने वाले रामजी भाई किसी पार्टी विशेष से ताल्लुक नहीं रखते। उन्हें 'हाथी-घाे़डों` से भी बैर नहीं। न ही वे इस बात की परवाह करते हैं कि 'दरबारे दिल्ली` तक कौन व्यि त 'साइकिल` पर बैठकर आया या 'कार` में या उसके हाथ में किस रंग का झंडा था। उन्हें तो फिक्र है बस इस बात की राजदुलारा 'राज` तो करे, लेकिन उसे 'दुलार` करने वाले समुदाय विशेष के लोग न होकर वे लोग हों, जो कहलाते हैं इस देश के 'आम आदमी`।

Monday, August 18, 2008

आखिर जमीन का एक कतरा ही तो है

छोटी-छोटी बातों पर बयान जारी करने वाले हमारे नेता जम्मू-कश्मीर के हालात पर मौन हैं। जबकि, बात यहां तक आ पहुंची है कि श्रीनगर में हमारे राष्ट ्रीय ध्वज का अपमान किया जा रहा है। वहां की इमारतों पर पाकिस्तान का झंडा लहराया जा रहा है। तुष्टि करण की राजनीति का शिकार देश के नेता इस मसले पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। उन्हें डर है उनके मुंह से निकले कुछ शब्द उनके वोट बैंक में सेंधमारी का कारण न बन जाएं। जबकि, जम्मू के हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। जमीन के एक टुकड़े के लिए दो संप्रदायों के लोग आमने-सामने हैं। मीडिया में आ रही खबरों में साफ दिखाई दे रहा है कि वहां का आम आदमी इस दिनों किन हालात में जी रहा होगा। भूमि हस्तांतरण मुद् दे की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेेंकी जा रही हैं। आम आदमी को हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मुद् दे की आड़ में उन तमाम बातों को अंतरराष्ट ्रीय मंच पर लाने का प्रयास किया जा रहा है, जिनकी कोशिश पहले भी कई बार होती रही हैं। बात साफ है अलगावादी लोग इस बात को उछालना चाहते हैं कि कश्मीर में मुसलमान खुश नहीं हैं, उन पर अत्याचार हो रहे हैं। दूसरा, वे कश्मीर के सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक ताने-बाने को एक पंथीय रूप देना चाहते हैं। कश्मीर के लोगों को भी इस देश केप्रत्येक नागरिक की तरह वे सभी अधिकार प्राप्त हैं, जो भारतीय संविधान में दर्ज हैं। लेकिन, कुछ अलगाववादी लोग धर्म की आड़ लेकर वहां की जनता को बहका रहे हैं। उनका एक ही मकसद है, भारत की अंखडता को छिन्न-भिन्न करना। वे नहीं चाहते की इस देश में एकता कायम रहे।
मेरा मानना है कि इस मुद् दे पर देश के बौद्धिक वर्ग को आगे आकर पहल करनी चाहिए। हिंदू-मुसलमान भाईचारे को कायम रखते हुए दोनों सुमदाय केलोगों को मिलजुलकर विवाद को सुलझाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर आज नहीं, आजादी केबाद से ही जल रहा है। इसका स्थायी समाधान है, लेकिन राजनैतिक लोगों से इसकी अपेक्षा करनी बेमानी है। योंकि अगर जम्मू-कश्मीर और वर्तमान भूमि हस्तांतरण जैसे मुद् दे समय पर सुलझा लिए गए, तो कई राजनेताआें की दुकाने बंद हो जाएंगी।
दूसरा राष्ट ्रीय स्वाभिमान के प्रतीक तिरंगे का अपमान करने वाले को कतई बख्शा नहीं जाना चाहिए। फिर चाहे वह किसी समुदाया का यों न हो। इसी तिरंगे की आन बचाने को हमारे फौजी आए दिन सीने पर गोलियां खाते हैं। लेकिन, तिरंगे को जमीन पर तक नहीं गिरने देते। फिर यह बात कैसे बर्दाश्त किया जा सकत है कि कोई इसी देश में रहते हुए देश के झंडे को जलाए। मुजफ्फराबाद रैली के दौरान और आगे-पीछे भी जम्मू-कश्मीर पर देश की जनता ने टीवी और समाचारों पत्रों में तिरंगे को जलाने की तस्वीरें साफ देखीं। उनकी मुठि् ठयां भिंच गइंर्। लेकिन, वे चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। योंकि यह खेल आम आदमी की पहुंच से बाहर है। देश का आम आदमी खिन्न है, वह धरना-प्रदर्शन तो कर सकता है, चिल्ला सकता है, लेकिन उसके हाथ में वह ताकत नहीं है, जो सीधे तौर पर ऐसे लोगों को मुंहताे़ड जवाब दे।

Saturday, August 9, 2008

निरंतरता

पंछी आते हैं आंगन में मेरे
और
घरौंदा बना लेते हैं
आम की उस डाल पर
जो दादा जी ने लगाया था
तब वे बू़ढे न थे
उनकी मूछों में ताव
और
भुजाआें में बल था
उनकी छांव में
एक परिवार बसता था
व त गुजरा
नन्हा पौधा बड़ा हो गया
और दादा जी बूढे हो चले
लेकिन
उनका लगाया नन्हा पौधा
आज भी खड़ा है आंगन में मेरे
वही दादाजी की मूछों वाला ताव
और अपनी शाखाआें में बल लिए
जो देता है फल
और हर आने जाने वाले को छांव
सावन में जब बच्चे झूला डालते हैं
उसकी शाखाआें पर
तब
उठती किलकारियां
तो झूम उठती हैं उसकी हर एक पत्तियां
कभी मैं भी झूलता था उसकी शाखाआें पर
झूला डाल, ...और अब मेरा बच्चा
मैं जानता हूं व त केसाथ
आम का ये पे़ड
जो लगाया था दादाजी ने मेरे
उन्हीं की तरह एक दिन बू़ढा हो जाएगा
लेकिन
खुशी होती है
उसके आस-पास उगते
उन नन्हे पौधों को देखकर
जो अब मैनें लगाए हैं
ये पौधे भी
इसी आम के पे़ड की तरह
एक दिन वृह्द आकार ले लेंगे
और
और फिर डालेंगी आने वाली पीढ़ियां इन पर झूला
मेरी तरह, मेरे बच्चे की तरह और....!
इति।

Friday, August 8, 2008

सिमी से इतना मोह यों ?

एक समाचार : सुप्रीम कोर्ट ने स्टूडेंट् स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) पर प्रतिबंध हटाने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट के विशेष ट्रिब्यूनल के आदेश पर रोक लगा दी।
अब आगे का खेल देखिए, अभी यह फैसला अदालत से बाहर भी नहीं आया था, हमारे राजनीतिज्ञों ने सिमी के हक में बयान तक जारी कर दिए। सपा प्रमुख मुलायम सिंह की मानें तो सिमी पर प्रतिबंध लगाने की बजाए राष्ट ्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। उनकेशब्दों में 'जब उत्तर प्रदेश में मेरी सरकार थी तो सिमी पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया।` वहीं राजनीतिज्ञों की जमात में इस विद्या के पंडित कहे जाने वाले 'ताऊ` लालू प्रसाद यादव का कहना है कि सिमी पर प्रतिबंध की जरूरत ही नहीं थी। प्रतिबंध लगाना ही है तो शिव सेना पर लगाओ, दुर्गा वाहिनी पर लगाओ।
इस संगठन का नाम (सिमी) देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर इसलिए नहीं चढ़ा कि इस संगठन ने अपने नाम के अनुरूप स्टूडेंट् स की भलाई के लिए किए गए अपने कामों से झं़डे गाढ़ दिए। बल्कि जब भी इस संगठन का नाम सुर्खियों में आया, तब-तब सिमी के साथ आतंक शब्द की गूंज साफ सुनाई दी। आज भी यह संगठन भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाली एक प्रमुख संस्था के रूप में जाना जाता है। देश में घट रही तमाम आतंकवादी घटनाआें में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के बाद अगर किसी संगठन का नाम आता है तो वह सिमी ही है। जो इस्लामिक स्टूडेंट् स मूवमेंट् स केनाम पर इस देश की नौजवान पीढ़ी की रगों में दहशतगर्दी का जहर घोल रही है। इस देश का राशनकार्ड लेकर इस देश की थाली में खाकर इसी देश केनौजवानोंं को बाढ़ बनाकर इस संगठन केकार्यकर्ता देश को खोखला करने में जुटे हैं।
ऐसे में अगर हमारे राज नेताआें के बयान इस संगठन के हक में आते हैं तो दुख होता है। दुख होता है यह सोचकर कि आखिर इस देश में हो या रहा है? जनता इन नेताआें को चुनकर संसद में भेजती है। इसलिए कि वे जनहित की बात करेंगे, देशहित की बात करेंगे। लेकिन, अगर राजनीति से प्रेरित इस तरह के काम हमारे राजनेता करने लगें तो फिर अभागी जनता कहां जाए?

Monday, August 4, 2008

एक कसक थी मन में...

आज सुबह विविध भारती पर बड़े गुलाम अली का एक भजन मन को बेहद सुकून दे गया। इस मायने में भी कि पिछले दिनों संसद में गुरु घंटालों की कारगुजारियों को देख मन व्यथित था। अभी ज्यादा व त नहीं हुआ हमारे सैनिक कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर चढ़ते हुए विपरीत स्थिति में आतंकवादियों से जूझ रहे थे। सैनिकों के शहीद होने की खबरें आती थी। पूरा देश गमगीन था और साथ ही अपने जवानों की शौर्य गाथा से अभिभूत भी। तब भी मन में यही कसक हुई थी। एक तरफ हमारे जवान सियाचीन करगिल जैसी ऊंची पहाड़ियों पर तैनात होकर देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते हैं, दूसरी तरफ हमारे नेता किस तरह इस देश की अस्मिता पर प्रहार कर रहे हैं। बेशक उनकेपास टीवी के माइक पर बोलने के लिए ऊंची आवाज है, उनके पास चमकता कुर्ता है, विरोधियों को चित्त करने के लिए फुहड़ डिबेट है। लेकिन, अगर उन्हें कुछ याद नहीं रहता तो शायद यही कि हर बार सीमा से हमारे कुछ सैनिक अधिकारियों के शहीद हो जाने की खबर रह-रह कर आती है।
संसद में नोट उछालने का वह दृश्य दिखा तो बहुत याद करने पर भी याद नहीं आया कि किसी मारधाड़ या स्टंट फिल्म के किसी सीन में इतने रुपए एक साथ देखे होंगे। नहीं याद आया। भारतीय मध्यम वर्ग का आम आदमी इतने रुपए तो फिल्म के पर्दे पर ही देखता है। यहां के जासूसी उपन्यासों में भी पैसों की बात होती है तो लेखक दस पांच लाख रुपए तक ही बात सीमित रखते हैं। तब करोड़ रुपए संसद के पटल पर रखे जा रहे थे। इस बात की उत्सुकता नहीं कि रुपए कहां से आए और किसने दिए। राजनीति के पतन में अब सब कुछ किसी भी स्तर तक हो सकता है। एक करोड़ नहीं प्रत्येक दलबदलू को पचास करोड़ भी चाहिए तो कुछ नेता कहे जाने वाले बिचौलिए उसका भी इंतजाम कर लेंगे।
बात फिर एक क्षण की। विविध भारती सुनने के लिए रेडियो स्विच ऑन किया तो ठुमरी पर कार्यक्रम चल रहा था। ठुमरी और वह भी बड़े गुलाम अली की। शायद सावन के महीने में विविध भारती ने समझ कर बड़े गुलाम अली की ठुमरी हरी ओम तत्सत को सुनाया होगा। इस भजन से अपनी पुरानी स्मृति जु़डी है। बचपन की याद है पिताजी ने कभी कहा था हरि ओम तत्सत, महामंत्र है, ये जपा कर, जपा कर, बड़े गुलाम अली ने बहुत भावविभोर होकर गाया है, कभी जरूर सुनना। फिर बाद में कहीं और भी जिक्र हुआ था। पर इस भजन को कहीं सुन नहीं पाया था। इसकी चाह में जगह जगह घूमा। मुंबई के रिदम हाउस, दिल्ली के बाजारों, दून का पल्टन बाजार, और भी बहुत जगह। बड़े गुलाम अली की कई कैसेट सीडी देखीं पर यह भजन नहीं दिखा। फिर एकाएक रेडियो पर उद्घोषिका ने बड़े गुलाम अली की ठुमरी का जिक्र करते हुए इस भजन का जिक्र किया तो मन चहक उठा। बरसों मन की चाह पूरी हो रही है। कुछ ही पलों में बड़े गुलाम अली की सधी आवाज गूंज रही थी। मैं सुन रहा था,
...एक दिन पूछने लगी शिव से शैलजा कुमारी, प्रभु कहो कौन सा मंत्र है कल्याणकारी, कहा शिव ने यही मंत्र है तू जपा कर जपा कर हरी ओम तत्सत, हरी ओम तत्सत। लगी आग लंका में हलचल मची थी, तो यों कर विभिषण की कुटिया बची थी, यही मंत्र उसके मकां पर लिखा था हरी ओम तत्सत, हरी ओम तत्सत। उस साधक के स्वरों में मैं खो सा गया। जहां अमृत का रस बरसता हो वहां हमारी नई पीढ़ी इससे अनजान यों है। मुझे थोड़ा तंज भी हुआ कि मुंबई में रहते मैंने विविध भारती में कमल शर्मा और यूनुस खान से इस भजन की चर्चा यों नहीं की। और तमाम गीत संगीत पर तो साथियों से जब-तब बातें होती रहती थी। वह मुझे कुछ न कुछ बताते। लेकिन, अब ही सही, मुझे वह सुनने को मिला जिसे पाने के लिए मैंं बहुत घूमा फिरा। वह स्वर मेरे कानों मेंं अब भी गूंज रहे हैं। सच कितनी संपन्न विरासत है हमारी। आप को भी यह सुनने को मिले तो जरूर सुनिएगा।

Friday, August 1, 2008

ऑटो वाले को 'ताजमहल` बनाने की सलाह दे आया

जब आज किसी नए शहर में प्रवेश करते हैं तो आपका पहला परिचय उस शहर के ऑटो-टै सी और रि शा चालकों से होता है। मोल-भाव के बाद आप अपने यथा स्थान की ओर चले जाते हैं। लेकिन इससे पहले जब आप चालाकी दिखाते हुए चालक से कहते हैं 'अरे! इतने कैसे ले लोगे, रोज का आना जाना है हमारा`, 'लूट मचा रखी है या?` 'इतने में चलना है तो चलो वरना अपना रास्ता नापो`। यकीन मानिए आपकी इस चालाकी के बाद भी आमतौर पर आप लूट लिए जाते हैं। मतलब आपकी चालाकी के बाद भी आप वाजिफ दाम से ज्यादा देकर ही अपने गन्तव्य तक पहुंचते हैं। ये मेरे-आपके और हिंदुस्तान के हर शहर की कहानी है। एक अनपढ़ ऑटो रि शा चालक कुछ पलों में ही आपके पूरे व्यि तत्व का चित्र अपने दिमाग में खींच लेता है। वह आपके जूते, कपड़ों, कंधे पर टंगे बैग, हाथ में लिए सूटकेस और सिर पर सजी हैट से जान लेता है कि अमुक शख्स से कितना वसूला जा सकता है। बची-कुची कसर आपकी जुबान पूरी कर देती है। रि शे वाले को सुनाई देने वाला आपका पहला स्वर, 'ये रि शा...!`, 'वो भईया...!`, 'अरे सुन...!`, 'सुनो भाई`, 'चलना है या?`। हिंदुस्तान में रि शा-ऑटो वालों के लिए प्रचलित ये स्वर उसे आपका जैसे आई कार्ड हाथ में थमा देते हैं। इन्हीं स्वरों की व्यंजना से वह दाम तक कर लेता है। इसके बाद बात फिर इज्जत की हो तो भला वह भी पीछे यों हटे। थक-हार कर आदमी दो-चार रुपए इधर-उधर कर उसी के बताए दाम पर उसके साथ चलने को मजबूर हो जाता है। यहां पर मैं रि शा चालकों की पैरवी नहीं कर रहा हूं। न ही रि शे वालों से जाे़डकर हमारे-आपके व्यि तत्व की पहचान बता रहा हूं। मैं दिखना चाहता हूं, समाज का वह चेहरा जिससे हम अ सर दो-चार होते हैं। लूटते हैं, पिटते हैं, घिसीयाते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। ऐसा नहीं है कि यही हिंदुस्तान की तस्वीर है। यह पूरी तस्वीर नहीं है, लेकिन इसे इसका वृहद्ध रूप कहा जा सकता है। मैं देश में ज्यादा तो नहीं घूमा हूं, लेकिन कई शहर इन्हीं रि शा-ऑटो चालकों की ईमानदारी के लिए भी जाने जाते हैं। इनमें मुंबई को शीर्ष पर कहा जाता है। मुंबई में आप गाड़ी से उतरने के बाद किसी भी ऑटो-रि शा या टै सी वाले से दाम तय कर लीजिए, इसके बाद वहां रह रहे अपने रिश्तेदार को फोन पर पूछिए, ऑटो वाला इतने पैसे मांग रहा है। तो वह यही कहेगा बिल्कुल ठीक है, आप उसमें बैठकर आ जाइए। यह मेरा खुद का अनुभव भी है। लेकिन, भारत के अधिकतर शहरों में आपको इस मामले में कटु अनुभव को ही ग्रहण करना पड़ेगा।
जालंधर में रहते हुए अपने तीन अनुभव आपके साथ साझा करना चाहूंगा।
पहला-जब मैं पहली बार जालंधर आया। रि शे वाले ने उस व त रेलवे स्टेशन से घर तक आने के मुझसे उतने पैसे लिए, जितने में मैं अब रेलवे स्टेशन से घर तक दो बार आता हूं।
दूसरा-देहरादून में तीन दिन की छुट् टी काटकर जब मैं जालंधर बस स्टैंड पर पहुंचा तो जून की भरी दोपहरी में पसीने से बूरेहाल था। मेरे घर की तरफ जाने वाला एक ऑटो चालक जोर-जोर से आवाज दे रहा था। मैं जाकर ऑटो में बैठ गया। लेकिन, भाई ने आधा शहर घुमाने के बाद मुझसे किराया भी पहले ही ले लिया और आधे रास्ते में छाे़ड दिया। मैं उस व त उससे लड़ने या उलझने की स्थिति में भी नहीं था और न ही चाहता था।
तीसरा-मौसम खुशगवार देकर हम तीन मित्रों ने बाजार घूमने की योजना बनाई। हम लोग बाजार गए और जाते हुए वाजिफ पैसे देकर, बाजार में खरीददारी करने लगे। इसके बाद बीयर पी, बारिश में भीगे और खूब मस्ती की। आते हुए उसी रूट पर जब मैने उसे बनते पैसे दिए, तो ऑटो वाला उसके डबल पैसे मांगने लगा। बहुत गुस्सा आया। उसे उसी के मुताबिक पैसे भी दिए, लेकिन इससे पहले उससे थाे़डी बहुत तकरार भी कर ली। ...और आते-आते उसे 'ज्यादा दिए` पैसों से 'ताजमहल` बनाने की सलाह भी दे डाली।