Monday, October 20, 2008

कब तक माफी मांगते रहोगे भज्जी !

विनोद के मुसान
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब आस्ट्रेलियाई गेंदबाज सायंमड और भज्जी विवाद एक लंबे एपिसोड के बाद खत्म हुआ। उस बात भारतीय संप्रभुता की थी, इसलिए पूरा देश भज्जी के साथ खड़ा था। इससे पहले भी भारतीय क्रिकेट टीम में स्थापित हो चुकेइस फिरकी गेंदबाज ने कई गलतियां की। जिनकी वे हर बार 'नादान` बनकर माफी मांग लेते हैं।
व्यवसायिक विज्ञापन फिल्मों में बाल खोलकर नाचने का मामला हो या अंतरराष्ट ्रीय फेम पर मैच के दौरान अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों से बार-बार पंगा लेने की बात, भज्जी का नाम हर बार उभरकर आया। थप्पड़ विवाद के समय लोगों ने कहा, भज्जी अब तो आपने हद कर दी। जालंधर में बैठी भज्जी की मां बोली, 'मेरा पुत्तर इंज नहीं कर सकदा` लेकिन, टीवी स्क्रीन पर श्रीसंत के बहते आंसू सबने देखे, जो व्यथित था अपने साथी खिलाड़ी के दुर्व्यवहार से। इस एपिसोड का अंत भी भज्जी की माफी के साथ हुआ। हालांकि इसके लिए उन्हें कुछ मैचों में प्रतिबंध की सजा भी भुगतनी पड़ी। लेकिन, अब 'सीता-रावण` विवाद के बाद लगता है विवादों में रहना भज्जी की नियति बन गई है। वे सुधरकर भी सुधरना नहीं चाहते। वे हर बार ऐसी गलती कर जाते हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और फिर अगले दिन कहते हैं 'मैनूं माफ कर दो`
गलतियां भी इनसान से ही होती हैं। हम और आप भी आए दिन कुछ कुछ गलतियां कर गुजरते हैं। लेकिन, अगर गलती एक 'शख्सियत` करती है, तो फिर गलती के मायने बदल जाते हैं। गलती 'महा-गलती` बन जाती है। बताने की जरूरत नहींं है कि एक अंतरराष्ट ्रीय परिदृश्य का व्यि अगर कुछ गलत कर गुजरता है तो समाज पर उसका या प्रभाव पड़ता है। भज्जी को भी यह बात समझनी चाहिए कि वे अब जालंधर के बल्टन पार्क में खेलने वाला कोई मामूली 'मुंडा` नहीं है। वह एक अंतरराष्ट ्रीय शख्सियत है, जिसकी हर बात एक अंतरराष्ट ्रीय खबर बन जाती है।
ताजा विवाद में तो भज्जी ने हद ही पार कर दी। अब वे कह रहे हैं, ऐसा उनसे अंजाने में हो गया। कोई भी कहेगा भज्जी आप 'दूध पीते बच्चे` तो नहींं हैं, जो आपसे अनजाने में हर बार गलतियां हो जाती हैं। किसी की धार्मिक भावनाआें को ठेस पहंुचाना भारत में अपराध है और आप अकसर यह अपराध कर जाते हैं।
अंत में
माफी मांग कर कोई छोटा नहीं हो जाता, अच्छी बात है, भज्जी भी इसका अनुसरण करते हैं। लेकिन, उन्हें सीख लेनी चाहिए अपने वरिष्ठ साथी सचिन तेंदुलकर से जो बुलंदियों के शिखर पर पहुंचकर आज भी स्वच्छ और सफेद चादर लिए खड़े है।

Wednesday, October 15, 2008

सादा जीवन, उच्च विचार, यही पहचान हैं उनकी

विनोद के मुसान
15 टूबर को एक संत का जन्मदिन था। बहुत से लोगों को नहीं पता। लेकिन उनका जन्मदिन था। समाचार पत्रों में सरकार, राजनीतिक पार्टियों या किसी संस्था ने कोई विज्ञापन नहीं दिया। शायद वे आज भी जीवत हैं ! इसलिए। लेकिन वे एक सच्चे संत हैं, इसलिए उनकी तरह उनके ' तों` को भी इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। माफ करना, जिस शख्सियत की मैं बात कर रहा हूं, उन्हें कभी सम्मानित मदर टैरेसा या सिस्टर अल्फोंसा की तरह संत की उपाधि प्रदान नहीं की गई। लेकिन, मेरी नजरों में वे किसी संत से कम नहीं। सादा जीवन उच्च विचार, यही पहचान है उनकी। 15 टूबर, 1931 को रामेश्वरम में एक मछुवारे के घर एक लाल ने जन्म लिया और एक दिन वह अपने कर्मों की बदौलत देश के सर्वोच्च नागरिक बन गए।
नाम बड़ा तो दर्शन भी बड़े। मैं बात कर रहा हूं पूर्व राष्ट ्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम की। एक ऐसे आदमी की जिन्होंने भारत को विकसित राष्ट ्र बनाने का सपना देखा। सपने तो हम-तुम भी देखते हैं, लेकिन हमारे सपनों में हम अपनी उन्नति को ढूंढते हैं, लेकिन वे हमेशा विश्व कल्याण की बात करते हैं। माफ करना मुझे भी ज्ञात नहीं था कि उनका जन्मदिन है। दफ्तर में एक खबर का संपादन करते हुए पता चला की फलां-फलां स्कूल में बच्चों ने पूर्व राष्ट्रपति का ७४वां जन्मदिन 'चिल्ड्रन एनोवेशन डे` के रूप में मनाया। अपनी सामान्य जानकारी पर अफसोस हुआ, लेकिन उससे भी ज्यादा अफसोस यह देखकर कि किसी भी राजनीतिक पार्टी या संस्था द्वारा उनके जन्मदिन पर एक बधाई का प्रेस नोट तक जारी नहीं किया गया। जरा-जरा सी बात पर हो-हल्ला करने वाले ये लोग कितने अवसरवादी हैं, यह देखकर दुख हुआ। इस बात से आप भी अनभिज्ञ नहीं हैं कि इस देश में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मायावती और सत्ता में बैठे ऐसे अन्य नेताआें के जन्मदिन पर पूरे का पूरा शहर बधाई देने वाले होर्डिंग्स से पाट दिया जाता है। कुछ पूर्व संतों का जन्मदिन आज भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। अच्छी बात है। लेकिन, इन सबके पीछे निहित स्वार्थ छीपे हैं। आज कई ऐसे संत हैं, जिन्हें उनके तों ने सिर्फ संत नहीं रहने दिया। बल्कि उनके नाम की आड़ में कई 'संस्थाएं` खोल रखी हैं। जिनको चलाने के लिए उनका जन्मदिन मनाना भी जरूरी हो जाता है। अगर वे ऐसा नहीं करें तो कई लोगों की राजनीतिक और धार्मिक संस्थाएं बंद हो जाएंगी।
खैर इस देश में बुरा लिखने को बुराईयों की कमी नहीं। मिसाइल मैन के जन्मदिन पर मेरी और तमाम दूसरे देशवासियों की तरफ से उनको ढेर सारी बधाईयां। मैं दुआ करूंगा उनके जीवित रहते उनका सपना जरूर साकार हो, ताकी मेरी तरह इस देश के सौ कराे़ड से ज्यादा लोगों को विकसित भारत में रहने का अवसर प्राप्त हो।

Thursday, October 2, 2008

कैसे खुश होगी 'बापू` की आत्मा

विनोद के मुसान
किसी को अपने घर-दफ्तर या कहीं और पहुंचने की इतनी जल्दी भी हो सकती है, यह देखकर बड़ी हैरानी हुई। मन में गुस्सा आया, सोचा यों इस व्यि से इसी की भाषा में बात की जाए। लेकिन, उसी पल गांधी जी का ध्यान आया और मैं मन मसोस कर रह गया। दूसरा, गांधी जयंती पर गांधीगीरी में भी बात कर सकता था, लेकिन उसका समय नहीं था। इसके बाद मैंने उस वृद्धा को सहारा देते हुए अमुक व्यि पर अफसोस जाहिर किया और आगे बढ़ गया। सोचा, ऐसा तो नहीं होना चाहिए था गांधी जी के सपनों का भारत। इस देश में जहां खचाखच भरी बस में बड़े-बू़ढों को देखकर नौजवान अपनी सीट छाे़ड देते हैं, भला ऐसा कोई कैसे कर सकता है।
दरअसल, साप्ताहिक अवकाश होने के चलते एक मित्र ने खाने पर आमंत्रित किया था। बस स्टैंड पर पहुंचकर मैं बस का इंतजार कर रहा था। तभी, विपरीत दिशा को जाने वाली एक लोकल बस आई और लोग उसमें भे़ड-बकरियों की तरह चढ़ने लगे। यहां तक तो ठीक था। लेकिन, अंत में जैसे ही एक वृद्धा बस में चढ़ने लगी, ठीक उसी पल बस भी चलने लगी। वृद्धा बस में चढ़ पाती, इससे पहले भागता हुआ एक युवक आया और वृद्धा को का देते हुए बस में चढ़ गया। वृद्धा जमीन पर पड़ी ठीक से संभल भी नहीं पाई थी कि बस चल पड़ी। मैं सारा मंजर देख रहा था। इसके बाद मेरे पास दो विकल्प थे। या तो मैं किसी तरह बस रुकवा कर उस युवक को सबक सिखाता या वृद्धा को संभालता। पल भर में मन में कई तरह के ख्याल आए, गुस्सा भी आया और हैरानी भी हुई। उस युवक की कम की लाचारी पर अफसोस करने के बाद अंतत: मैंने वृद्धा को उठाया और बगल की एक दुकान से पानी लाकर पिलाया। दुकान वाले को ही वृद्धा को सुरक्षित बस बैठाने का आश्वासन लेकर मैं आगे बढ़ गया।
दिन था, दो टूबर। यानी गांधी जी का जन्मदिवस। इस दिन को भारत ही नहीं वरन पुरी दुनिया में अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में उपरो मंजर की कल्पना कीजिए और फिर कहिए, 'मेरा भारत महान` यकीनन, अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो जरूर आपका सिर शर्म से झुक गया होगा। गांधी जैसे महान व्यि तत्व के आदर्श तो बहुत ऊंचे थे, ये तो छोटी सी बात है। बड़े-बू़ढों का सम्मान करो, सड़क पर कू़डा मत फेंकों, पंि में आकार व्यवस्था बनाए रखने में साथ दो आदि तमाम ऐसी व्यवहारिक बातें शायद कुछ लोगों ने सीखी ही नहीं हैं। और कुछ लोग जिन्हें इनका ज्ञान है, वे इन बातों को अपने व्यवहार में ही नहीं लाते। मन में ग्लानि सी होती है, जब कोई अंग्रेज हमारी दरिद्रता, भूख, गरीबी और अल्प व्यवहारिक ज्ञान को कैमरे में कैद कर अपने देश ले जाता है। इस देश में अपार सुंदरता भी है, लेकिन हम उसे प्रस्तुत नहीं कर पाते। इस देश में ज्ञान भी और सम्मान भी, लेकिन हम उसे बांट नहीं पाते। हम लड़ते हैं, झगड़ते हैं और कुछ स्वार्थी लोगों को कहते हैं, आओ देखो हमारा घर जल रहा है, चाहो तो आकर अपनी रोटियां सेंक लो। बापू के सपनों का भारत, शायद ऐसा नहीं रहा होगा।
अंत में
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, सुधरने की कसम खाने के लिए किसी खास दिन की दरकार नहीं होनी चाहिए। बापू का जन्मदिवस इस साल की तरह हर साल आएगा। लेकिन, कोशिश यही होनी चाहिए अगली बार जब बापू की आत्मा ऊपर से देखे तो उसे वृद्धा को सहारा देकर बस में चढ़ता कोई युवक दिखाई दे। यकीन मानिए बापू की आत्मा जरूर खुश होगी।