Thursday, October 2, 2008

कैसे खुश होगी 'बापू` की आत्मा

विनोद के मुसान
किसी को अपने घर-दफ्तर या कहीं और पहुंचने की इतनी जल्दी भी हो सकती है, यह देखकर बड़ी हैरानी हुई। मन में गुस्सा आया, सोचा यों इस व्यि से इसी की भाषा में बात की जाए। लेकिन, उसी पल गांधी जी का ध्यान आया और मैं मन मसोस कर रह गया। दूसरा, गांधी जयंती पर गांधीगीरी में भी बात कर सकता था, लेकिन उसका समय नहीं था। इसके बाद मैंने उस वृद्धा को सहारा देते हुए अमुक व्यि पर अफसोस जाहिर किया और आगे बढ़ गया। सोचा, ऐसा तो नहीं होना चाहिए था गांधी जी के सपनों का भारत। इस देश में जहां खचाखच भरी बस में बड़े-बू़ढों को देखकर नौजवान अपनी सीट छाे़ड देते हैं, भला ऐसा कोई कैसे कर सकता है।
दरअसल, साप्ताहिक अवकाश होने के चलते एक मित्र ने खाने पर आमंत्रित किया था। बस स्टैंड पर पहुंचकर मैं बस का इंतजार कर रहा था। तभी, विपरीत दिशा को जाने वाली एक लोकल बस आई और लोग उसमें भे़ड-बकरियों की तरह चढ़ने लगे। यहां तक तो ठीक था। लेकिन, अंत में जैसे ही एक वृद्धा बस में चढ़ने लगी, ठीक उसी पल बस भी चलने लगी। वृद्धा बस में चढ़ पाती, इससे पहले भागता हुआ एक युवक आया और वृद्धा को का देते हुए बस में चढ़ गया। वृद्धा जमीन पर पड़ी ठीक से संभल भी नहीं पाई थी कि बस चल पड़ी। मैं सारा मंजर देख रहा था। इसके बाद मेरे पास दो विकल्प थे। या तो मैं किसी तरह बस रुकवा कर उस युवक को सबक सिखाता या वृद्धा को संभालता। पल भर में मन में कई तरह के ख्याल आए, गुस्सा भी आया और हैरानी भी हुई। उस युवक की कम की लाचारी पर अफसोस करने के बाद अंतत: मैंने वृद्धा को उठाया और बगल की एक दुकान से पानी लाकर पिलाया। दुकान वाले को ही वृद्धा को सुरक्षित बस बैठाने का आश्वासन लेकर मैं आगे बढ़ गया।
दिन था, दो टूबर। यानी गांधी जी का जन्मदिवस। इस दिन को भारत ही नहीं वरन पुरी दुनिया में अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में उपरो मंजर की कल्पना कीजिए और फिर कहिए, 'मेरा भारत महान` यकीनन, अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो जरूर आपका सिर शर्म से झुक गया होगा। गांधी जैसे महान व्यि तत्व के आदर्श तो बहुत ऊंचे थे, ये तो छोटी सी बात है। बड़े-बू़ढों का सम्मान करो, सड़क पर कू़डा मत फेंकों, पंि में आकार व्यवस्था बनाए रखने में साथ दो आदि तमाम ऐसी व्यवहारिक बातें शायद कुछ लोगों ने सीखी ही नहीं हैं। और कुछ लोग जिन्हें इनका ज्ञान है, वे इन बातों को अपने व्यवहार में ही नहीं लाते। मन में ग्लानि सी होती है, जब कोई अंग्रेज हमारी दरिद्रता, भूख, गरीबी और अल्प व्यवहारिक ज्ञान को कैमरे में कैद कर अपने देश ले जाता है। इस देश में अपार सुंदरता भी है, लेकिन हम उसे प्रस्तुत नहीं कर पाते। इस देश में ज्ञान भी और सम्मान भी, लेकिन हम उसे बांट नहीं पाते। हम लड़ते हैं, झगड़ते हैं और कुछ स्वार्थी लोगों को कहते हैं, आओ देखो हमारा घर जल रहा है, चाहो तो आकर अपनी रोटियां सेंक लो। बापू के सपनों का भारत, शायद ऐसा नहीं रहा होगा।
अंत में
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, सुधरने की कसम खाने के लिए किसी खास दिन की दरकार नहीं होनी चाहिए। बापू का जन्मदिवस इस साल की तरह हर साल आएगा। लेकिन, कोशिश यही होनी चाहिए अगली बार जब बापू की आत्मा ऊपर से देखे तो उसे वृद्धा को सहारा देकर बस में चढ़ता कोई युवक दिखाई दे। यकीन मानिए बापू की आत्मा जरूर खुश होगी।

कौशल्या को अफसोस, राम जैसी यों न हुई संतान


नदीम अंसारी/अरुण सरीन
कभी बुजुर्गों से ही किसी भी घर का रुतबा तय होता था। अफसोस अब ऐसे तमाम परिवार हैं, जिनमें खुद बुजुर्गों का ही रुतबा खत्म होता जा रहा है। शायद इसीलिए वृद्धाश्रमों और ओल्डएज होम्स में तेजी से ऐसे बुजुर्गों की तादाद बढ़ रही है, जो भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद बेसहारा हैं। विश्व वृद्धजन दिवस पर लुधियाना स्थित स्वामी विवेकानंद वृद्धाश्रम का मंजर देखकर कुछ ऐसा ही अहसास हुआ। इसमें लंच के टकटकी लगाए बुजुर्ग औरत कौशल्या कुछ सोच रही है। शायद उनके जहन में यही सवाल कौंध रहा था कि उन्हें कौशल्या जैसा नाम तो मिला, लेकिन भगवान राम जैसे आज्ञाकारी संतान उनकी कोख से यों पैदा हुई?
बातचीत का सिलसिला शुरू करने की मंशा से जैसे ही मालूम किया कि आपकी कितनी औलाद...बस वह मानो फट पड़ीं। कमोबेश चीखते हुए बोलीं 'गोली मारो औलाद को..` और आगे मानो उनकी भीगी आंखों ने सब कुछ कह दिया। यह उन पर पड़ी बुरे की मार थी, लेकिन मन को यकीन नहीं हो रहा था कि औलाद नाम से किसी मां को भी इतनी नफरत हो सकती है। बंटवारे के दौरान पाकिस्तान से पंजाब आई तीन बेटों और दो बेटियों वाली इस मां का इलजाम है कि औलाद ने उसको ठुकरा दिया। बस कभी-कभार छोटी बेटी मिलने जाती है।
इसी आश्रम में रहने वाले बुजुर्ग ज्ञानप्रकाश अब भी ज्ञान का प्रकाश बांट रहे हैं। जिंदगी भर खून-पसीने की कमाई जोड़ी, मकान बनाकर चार बेटों को बांट दिया। पेंशन सबसे छोटे बेटे की लड़की का ब्याह करने में लगा दी, योंकि वह अनाथ हो गई थी। वह आह भरकर कहते हैं कि जायदाद की खातिर औलाद ने ही बेघर कर दिया। इसके बावजूद औलाद की लंबी उम्र की दुआ करते वो नई पीढ़ी को यही संदेश देते हैं कि अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। कोई आपके साथ भले ही बुरा करे, अच्छाई से उसका जवाब दो। चश्मे के पीछे से झांकती हरबंस लाल की बू़ढी आंखों को अब इसी आश्रम से आस है। दो कमाऊ बेटों के रहते पहले पत्नी के साथ वृद्धाश्रम में रहे, पत्नी की मौत के बाद घर लौटे तो फिर एक बेटे की मौत हो गई, दूसरे बेटे ने सहारा नहीं दिया तो इसी 'पुराने घर` में लौट आए।
इसी वृद्धाश्रम में रह रही कृष्णावंती को इकलौते बेटे से बड़ी आस थी कि वह बु़ढापे का सहारा बनेगा, मगर इस उम्र में यह बुजुर्ग औरत बेसहारा है। यहां रहने वाली सुहाग रानी और शांति जैसी ज्यादातर बुजुर्ग औरतों की एक जगजाहिर शिकायत यह भी है कि बहुआें ने उनके बेटों को बिगाड़ा और बेघर करा दिया।
साभार - अमर उजाला

Wednesday, October 1, 2008

प्यास

वो खामोश आवाज
आज बोल उठी
कि कहो,
उस मौन में दबी

वो आहट

जो ली थी तुमने अभी

कुछ समय पहले

कि कहो!

जो मैं सुनना चाहती हूं

मैंने कहा...

अभी मैं सागर में डूबा नहीं

अभी मैं बच सकता हूं

अगर तुम कहो
मैं वापस आ सकता हूं
उसने सुना और कहा

मैं समझी नहीं

मैं सुनना चाहती हूं

जो तुमने कहा
पर मैने सुना नहीं
फिर मैं कुछ देर मौन रहा

एक आहट सी ली

और कहा सुनो

सुनना जो तुम चाहती हो

उसमें अभिव्यि त है मेरी

कुद सपने संझौती
खुशियां हैं मेरी
या तुम उन्हें अपने पहलू में जगह दे सकती हो
मुझे अपना और
खुद को मेरी कह सकती हो
एक हल्की सी
आहट उसने भी ली
कुछ देर सन्नाटा रहा

फिर मैने कहा
कि
अब तुम कहो

सुनना जो मैं चाहता हूं

उसने कुछ कहा

कुछ, बहुत कुछ कहा

मैने सुना

यकिन नहीं आता

या उसने वही कहा
जो मैने सुना
विनोद के मुसान

जख्म



तड़पता जख्म हूं मैं

कोई मरहम नहीं

जानता हूं मैं

तुम्हें सब्र है जिसकी

वो उम्मीद हूं मैं

तुम्हें आस है जिसकी

वो तलाश हूं मैं

तेरे हाल से वाकिफ हूं मैं

मगर मायूस हूं मैं


Monday, September 29, 2008

पाक से दोस्ती


1999 में जब हमारे प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान यात्रा केदौरान वहां केप्रधानमंत्री नवाज शरीफ से गले मिल रहे थे, ठीक उसी दौरान पाकिस्तानी फौजें कारगिल की पहाड़ियों पर चढ़ाई कर रही थी। दोस्ती की आड़ में पाकिस्तान ने जो खंजर हमारी पीठ में घोंपा था, उसे मैंने श्री वाजपेयी जी के शब्दों में कुछ यूं बयां किया...

तेरी दोस्ती का ऐसा कायल हुआ हूं मैं
खुद अपनी ही जमीं पर घायल हुआ हूं मैं

तेरी
वफा की ख्वाहिश वर्षों तलक रही

अब तो इंतहा की भी हद गुजर चुकी

आज भरे बाजार में रुसवा हुआ हूं मैं
खुद अपनी ही जमीं पर घायल हुआ हूं मैं

तू अपनी जफा पर कभी न हुआ शर्मिंदा
बस ये देखते ही देखते हम रह गए

व त का देखो कैसा हुआ तसव्वुर
तेरी दोस्ती की ख्वाहिश में बह गया हूं मैं

सुना
था मौसम की तरह दोस्त भी बदल जाते हैं
हम समझते रहे पत्थर भी पिघल जाते हैं

पर तू न बदला ऐ मेरे दोस्त
यही गम अपने दिल में लिए जाता हूं मैं

तेरी
दोस्ती का ऐसा कायल हुआ हूं मैं
खुद अपनी ही जमीं पर घायल हुआ हूं मैं


यह कविता दयानंद ब्रिजेंद्रा स्वरूप महाविद्यालय, देहरादून (डीबीएस कालेज) की वार्षिक पत्रिका 'विज्ञानदा` वर्ष 1998-99 केअंक में प्रकाशित हो चुकी है। मैं उस व त बी.एससी तृतीय वर्ष का छात्र था, पहली दो लाइनें मेरे अजीज मित्र श्री अतुल भंडारी की हैं, जो उन्होंने बातों ही बातों में कह दी थीं। इसके लिए उन्हें धन्यवाद।)

Friday, September 26, 2008

बंद करो फिल्मी लोगों को 'सितारे` कहना

विनोद के मुसान
अगर 'फिल्मी लोग` सितारों सी चमक बिखेरते तो, जरूर इनके चेहरों पर सितारों सा नूर होता। लेकिन, अफसोस ऐसा नहीं है। इनकी चमक सिनेमा के पर्दे पर तो दिखाई देती है मगर असल जिंदगी में इनके चेहरे धुंधले से नजर आते हैं। इसलिए अब व त आ गया है, जब आम लोगों को भी इन्हीं की तरह प्रोफेशनल बनकर सोचना पड़ेगा। 'सितारों` को सितारा कहना बंद करना पड़ेगा। एक हाथ से टिकट के पैसे लो, दूसरा लोगों को वो दिखाओ, जिसके लिए उन्होंने पैसे खर्च किए हैं। बात खत्म। रुपहले पर्दे के सितारे...। अरे...! किस बात के सितारे भाई? पर्दे पर नाच-गा कर ऐसा कौन सा तीर मार लिया, जो आपको सितारों का दर्जा दे दें।
वर्तमान परिदृश्य में सिनेमाई पर्दे की जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, इसके बाद तो इन्हें सितारा कहना भी सितारों की तौहीन है। सितारे इस जग को रोशन करते हैं। रात में टिमटिमा कर हमारी आंखों को सुकून देते हैं। बच्चों के सपनों में बसते हैं और दादा-दादी की कहानियों में आकर हमें मीठी लोरी सुनाते हैं। सदियों से सितारों ने दुनिया में नूर बिखेरने का काम किया है। पता नहीं लोगों ने कब और यों पर्दे पर नाचने-गाने वालों को 'सितारा` कहना शुरू कर दिया। जिस किसी ने भी ये शुरुआत की होगी, जरूर हकीकत की दुनिया से बाहर जीता होगा। अच्छा लगता अगर इस परंपरा के साथ देश के महान सुपूतों का नाम जु़डता। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, शहीदे आजम भगत सिंह, रवींद्र नाथ टैगोर, मदर टैरेसा और कई ऐसी महान शख्सियतों को सितारा कहना सुखद लगता है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन दूसरों की भलाई में लगा दिया। इनके द्वारा किए गए कामों की चमक आज भी बरकरार है और सदियों तक रहेगी।
रही बात फिल्म इंडस्ट्री में सितारे कहलाने वाले कलाकारों की, तो मुझे नहीं लगता इनमें से किसी एक ने भी कोई ऐसा काम किया हो (अभिनय को छाे़डकर) जिसे आने वाली पीढ़ी याद रखे।
आम लोग इन लोगों को भगवान की तरह पूजते हैं। भारत में तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो घर में फिल्मी कलाकारों की फोटो की पूजा करते हैं। इनका जन्मदिन आने पर बाकायदा पार्टी आयोजित की जाती है, केक काटकर इनकी फोटो को 'खिलाया` जाता है। चिढ़ होती है ऐसे ढकोसलों को देखकर। दो रोज पहले की बात है। मैं एक समाचार पत्र में एक संक्षिप्त सी खबर पढ़ रहा था। सलमान खान की एक फैन ने उसकी दुल्हन के लिए आठ लाख रुपए कीमत की डोली तैयार की है, जिसे वह उसकी शादी में गिफ्ट करना चाहती है। उसी समाचार पत्र के एक हिस्से में बिहार, उड़ीसा में आई बाढ़ का जिक्र भी था और बाढ़ पीड़ितों की मदद को गुहार भी। यकीन मानिए इस समाचार को पढ़ने के बाद उस 'दानी फैन` के लिए मन से कोई भी अच्छी बात नहीं निकली।
पीछे कुछ फिल्मी कलाकारों ने राजनीति में आकार देश सेवा करने की पहल भी की। आम जनता को लगा उनके हीरो परदे की तरह संसद में भी धूम मचाएंगे। उनकी सारी मुश्किलें फिल्म के 'एेंड` की तरह सुखद क्षणों के साथ खत्म हो जाएंगी। लेकिन, असल जिंदगी में या हो रहा है, ये सब जानते हैं। उत्तरी मुंबई के मतदाताआें को तो अपने फिल्मी सांसद को ढूंढ कर लाने वाले को बतौर ईनाम एक कराे़ड रुपए देने तक की घोषणा कर दी गई थी। फिल्मी परदे पर तोते की तरह पटर-पटर बोलने वाले ये 'माननीय` जब एक बार किसी को थप्पड़ मारने के केस में फंसे तो इनका चेहरा टीवी पर देखने लायक था। बोलती जैसे बंद हो गई, जुबान ने दिमाग का साथ छाे़ड दिया और ये हकलाने लगे।
स्टार का जिक्र हो और 'सुपर स्टार` की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। एक जमाने से 'सुपर स्टार` का तमगा लिए घूम रहे बिग 'बी` की पूरी जिंदगी अपने इस तमगे को बचाने में ही चली गई। लोगों ने प्यार दिया, सम्मान दिया 'सुपर स्टार` का तमगा दिया। अब कोई इनसे पूछे माननीय आपने समाज को या दिया। इतनी शोहरत पाने के बाद चाय में थाे़डी 'चीनी कम` रह भी जाती तो या होता। आपने पूरी जिंदगी दोनों हाथों से दौलत बटोरी है। कितना अच्छा होता अगर आप इस दौलत का एक छोटा सा अंश समाज की भलाई में लगा देते। यकीन मानिए, इस दुनिया से जाने के बाद भी बिग 'बी` कहलाते।

Saturday, September 20, 2008

एक खुला पत्र 'दोस्त` के नाम


उस बच्ची को चेहरा आज भी आंखों के सामने आ जाता है। जब उसने कहा था 'बाबा मैं भी स्कूल जाना चाहती हूं।` ...और अचानक उसके बाबा ने कहा 'हां बेटा यों नहीं, तुम भी कल से स्कूल जाओगी।` हमें खुशी हुई, चलो हम अपने प्रयास की कड़ी में एक और ऐसी बच्ची का नाम जाे़ड पाए, जो अब शिक्षित होकर समाज में उजाला फैलाएगी।
थै स अंजुला। तुमने कर दिखाया।
मैं जनता हूं, तुम आज भी इस नेक काम में लगी हो। दो साल पहले जब तुम स्कालरशिप लेकर अमेरिका पढ़ने चली गई थी, उसकेबाद से मुलाकात नहीं हुई। लौटी तो कुछ पुराने दोस्तों ने बताया कि तुम फिर से अपने काम में लग गई हो। गरीब बच्चियों को शिक्षा के मंदिर तक पहुंचाने का तुमने जो बीड़ा उठाया है, मैं उसे सलाम करता हूं। हां अफसोस जरूर रहेगा कि तुम्हारी इस मुहिम में मैं बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सका। जिस समय तुम अमेरिका की उड़ान भर रही थी, उस व त मैं लाहौरी ए सप्रेस में बैठकर एक नए अखबार के साथ जु़डने जालंधर की यात्रा पर था। इन दिनों अचानक कुछ ऐसा वाकया सामने आया कि तुम्हारी याद आ गई। सोचा फिर कभी मौका मिला तो जरूर मिलकर काम करेंगे। ऊपर लिखी लाइनों को पढ़कर शायद तुम्हारे सामने भी अंजनीसैण (टिहरी गढ़वाल) की उस बच्ची का चेहरा याद आ गया हो, जो उस व त घास लेकर आ रही थी। वह पढ़ना चाहती थी, लेकिन उसके पारिवारिक हालात उसे इस बात की इजाजत नहीं दे रहे थे। फिर हमने मिलकर पहल की और उसके बाबा को मना लिया। मुझे याद है, वह बच्ची बराबर स्कूल जाए, इसके लिए तुमने उस बच्ची की पढ़ाई का पूरा खर्च भी अपने कंधों पर ले लिया था। ...और फिर यह तो एक उदाहरण है। मैं जानता हूं, तुमने अपनी संस्था के माध्यम से सैकड़ों बच्चियों को गोद लिया है, जिनकी पढ़ाई का खर्च तुम आज भी उठा रही हो। तुमने खुद जिस स्तर की पढ़ाई की थी, उसके बाद तुम चाहती तो किसी भी मल्टीनेशनल कंपनी के साथ जु़डकर एक आलीशान जिंदगी गुजार सकती थी। कोई फर्क नहीं पड़ता, ज्यादातर लोग आज ऐसा ही कर रहे हैं। हां, इतना जरूर है फिर शायद मैं तुम्हें यह खुला पत्र कभी नहीं लिख पाता। लेकिन, आज मैं गर्व से कहता हूं, तुम मेरी दोस्त हो। तुम्हें याद होगा, जब हम शुरू में मिले थे तो मैं तुम्हें मैम कहकर संबोधित करता था, फिर तुमने अपने साथ जु़डे छोटी-बड़ी उम्र के साथियों की तरह मुझे भी नाम लेकर संबोधित करने का हक दिया। शुरू में मैं कई बार गलती कर जाता था और बार-बार तुम्हें मैम कहकर पुकारता था। अच्छा लगा तुम्हारा ये खुलापन। यकीन मानो इसके बाद तुम्हारे इस दोस्त की नजरों में तुम्हारा कद और ऊंचा हो गया। इन दिनों मैं पंजाब में हूं। शिक्षा को लेकर यहां के हालात भी इतर नहीं हैं। पुस्तैनी जायजाद और डालर की चमक में शिक्षा की अलख बराबर धूमिल होती नजर आ रही है। ...और जिनके पास गंवाने को कुछ नहीं, उनके हालात के बारे में तुम खुद ही अंदाजा लगा सकती हो। युवा वर्ग नशे के दलदल में फंसा है। अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन, अच्छी खबर यह है कि अंधेरे के इस मायाजाल में तुम्हारी तरह कुछ लोग हैं, जो ज्ञान की अलख को बराबर जलाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। उम्मीद की जा सकती है आने वाले समय में हालात बेहतर होंगे।
अंत में,
मेरी आदरणीय दोस्त, इस पत्र को पढ़ने के बाद शायद तुम्हारे दिमाग में यह प्रश्न उठे कि मैंने तुम्हें यह खुला पत्र यों लिखा। तो इस बारे में मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा, मेरे देश को मेरी दोस्त की तरह और बेटियों की जरूरत है, अगर किसी और को वह मिल जाएं तो उनसे जरूर दोस्ती कर लेना।
भूलचूक के लिए क्षमायाचना के साथ
तुम्हारा दोस्त
विनोद के मुसान