Tuesday, April 27, 2010

व्यक्तित्व के धनी बहुगुणा

सूर्यकांत धस्माना
भारतीय राजनीति के क्षितिज पर पांच दशकों तक एक नक्षत्र की तरह चमकने वाले हेमवतीनंदन बहुगुणा का व्यक्तित्व चमत्कारी था। आत्मविश्वास उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी। 25 अप्रैल, 1919 को गढ़वाल जिले के बुघाणी गांव में पैदा हुए बहुगुणा ने वर्ष 1938 में उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद के राजकीय इंटर कॉलेज में दाखिला लिया। तब इलाहाबाद राष्ट्रीय आंदोलन का बड़ा केंद्र था। हेमवतीनंदन बहुगुणा पर भी आजादी के आंदोलन का ज्वार चढ़ा। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में तो उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। उसी आंदोलन के दौरान उनकी मुलाकात युवा आंदोलनकारी कमला त्रिपाठी से हुई, जिनसे बाद में उनका विवाह भी हुआ।
ब्रिटिश हुकूमत ने बहुगुणा को जिंदा या मुर्दा पकडऩे वाले को 2,000 रुपये पुरस्कार देने की घोषणा की थी। तब यह रकम छोटी नहीं थी। आखिरकार फरवरी, 1943 में वह दिल्ली में जॉर्ज पंचम की मूर्ति तोडऩे के प्रयास में बीजू पटनायक व मन्नू भाई शाह के साथ पकड़े गए। दिल्ली से वह नैनी सेंट्रल जेल लाए गए, पर 1945 में गंभीर बीमारी के कारण उनको रिहा कर दिया गया।
देश की आजादी के बाद बहुगुणा कांग्रेस की राजनीति मे सक्रिय हो गए। वर्ष 1952 में प्रथम आम चुनाव में वह इलाहबाद संसदीय क्षेत्र के करछना विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और जीते। वर्ष 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में बनी सरकार में बहुगुणा जी को पहली बार संचार राज्यमंत्री का दायित्व मिला। लेकिन 1973 में उत्तर प्रदेश में पीएसी ने जब विद्रोह कर दिया, तो जलते हुए प्रदेश को शांत करने के लिए बहुगुणा जी को प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में भेजा गया था।
आपातकाल के दौरान बहुगुणा व इंदिरा गांधी के बीच सैद्धांतिक मतभेद हुए और 28 अक्तूबर, 1975 को उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। वह विपक्षी राजनीति में शामिल हुए और जनता पार्टी सरकार में मंत्री भी बने। लेकिन वर्ष 1980 में देश में मध्यावधि चुनाव हुए। इन चुनावों से पूर्व श्रीमती गांधी ने बहुगुणा के घर जाकर उनको कांगे्रस में लौटने का निमंत्रण दिया, तो बहुगुणा जी ने यह निमंत्रण स्वीकार कर लिया। 1980 के मध्यावधि चुनाव में पूरी शक्ति के साथ चुनाव अभियान संचालित किया। बहुगुणा पहली बार अपनी मातृभूमि गढ़वाल से चुनाव लड़े व जीते। लेकिन जब केंद्र में श्रीमती गांधी के नेतृत्व में कांगे्रस की सरकार गठित हुई, तो उसमें बहुगुणा को स्थान नहीं मिला। इसी दौरान फिर उनके मतभेद श्रीमती गांधी से इतने बढ़े कि मई 1980 को उन्होंने न केवल कांगे्रस से, बल्कि लोकसभा की सदस्यता से भी त्यागपत्र दे दिया।
कांगे्रस छोडऩे के बाद बहुगुणा ने लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी का गठन किया। वर्ष 1987 में चौधरी चरण सिंह की मृत्यु के बाद बहुगुणा लोकदल के अध्यक्ष बन गए। लोकदल के विभाजन के समय उसके ज्यादातर बड़े नेता, जिनमें बीजू पटनायक, लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव आदि बहुगुणा के साथ लामबंद थे। इसी दौरान देश में बोफोर्स का जिन्न बोतल से बाहर आया और विश्वनाथ प्रताप सिंह बिना किसी संघर्ष के विपक्षी राजनीति के हीरो बन गए। बहुगुणा ने उस वक्त स्पष्ट कर दिया कि सांप्रदायिक पार्टियों के साथ वह कभी खड़े नहीं होंगे। लेकिन तब तक बहुगुणा मन व मस्तिष्क से तो नहीं, पर शरीर से थक गए थे। उनको बाईपास सर्जरी के लिए क्वींसलैंड जाना पड़ा, जहां 17 मई, 1989 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
(लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हैं)
साभार : धस्माना जी का यह लेख 24 अप्रैल को 'अमर उजाला ’ के संपादकीय पृष्ठï से लिया गया है।

Monday, April 19, 2010

कुंभ से साक्षात्कार

इन दृश्यों की शब्दों में अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती है। यह अद्ïभुत हैं, अलौकिक हैं। आंखों को तृप्त कर देने वाले। संसार में ऐसा समागम शायद ही कहीं और देखने को मिले। इसके बाद आप नास्तिक होते हुए भी अपने को उस भीड़ से जुड़ा पाते हैं, जो आस्था के भवसागर में तरने आई है।
बहुत लोगों को इस बात पर बहस करते सुना है, यह कुंभ नहीं महाकुंभ है। जो बारह साल बाद आया है और बारह साल बाद फिर आएगा। लेकिन कुछ भी हो, यह बे-मिशाल है। तमाम संस्कृतियों को ऐसा भवसागर, जिसमें हर कोई तरने आया है। होश संभालने के बाद यह दूसरा मौका है, जब कुंभ से मेरा साक्षात्कार हुआ।

विनोद के मुसान
पहला साक्षात्कार
1998 में जब मैं बी.एससी द्वितीय वर्ष का छात्र था। उस वक्त मेरी उम्र महज 17-18 साल थी। शौक के लिए फोटाग्राफी सीख रहा था। मेरे जीजा जी के एक मित्र हैं, रविंद्र पाल ग्रोवर, जिन्हें लोग बंटी भईया के नाम से जानते हैं। उन्हीं दिनों कुंभ मेला प्रशासन की ओर से उन्हें पूरे कुंभ की फोटोग्राफी और विडियो कवरेज का काम मिला था। जिसमें करीब 15 लोगों की टीम बनी। 'त्रिवेणी कंप्यूनिकेशन ’ की इस कंपनी में कई जाने-माने फोटोग्राफरों को शामिल किया गया। सभी लोग पेशेवर और मझे हुए थे, जबकि मेरी सिर्फ शुरुआत थी। हरिद्वार में शिव चौक स्थित मोती महल धर्मशाला में हम लोगों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी।
इधर, कुंभ में पहले ही दिन मेरी ड्ïयूटी तात्कालिक मेला अधिकारी जेपी शर्मा के साथ लग गई। 'जैनित ’ का पुरना स्टील कैमरा मेरे पास था, जो मेरा खुद का नहीं था। कुंभ के विकास कार्यों को देखने निकला मेलाधिकारी का काफिला आधे दिन तक भ्रमण पर रहा। इसके बाद डाम कोठी में मीटिंग थी, (तब मेला नियंत्रण भवन नहीं बना था।) जो देर शाम तक चली।
सुबह से लेकर शाम तक मैंने पूरे दिन में रिकार्ड 450 फोटो खींचे थे। इसकी एवज में प्रति प्रिंट हमें 3 रुपए मिलते थे। यानी कुंभ में मैंने पहले ही दिन 1350 रुपए की कमाई की थी। इसके बाद तो जैसे मेरी निकल पड़ी। तय कार्यक्रम के मुताबित हमें एक दिन पहले बता दिया जाता कि फलां व्यक्ति की ड्ïयूटी कहां और किस अधिकारी के साथ रहेगी।
कब कितनी फोटो खींची जाएं, इसकी कोई बाध्यता नहीं थी। विकास कार्यों के भ्रमण के दौरान किसी निर्माण कार्य की तरफ अधिकारी का हाथ उठा और नीचे आते-आते मैंने पांच क्लिक कर दिए। कुल जमा 15 दिन के भीतर मैंने इतने पैसे जमा कर लिए कि अब मैं अपनी कामचलाऊ किट (कैमरा, फ्लैश, लांग जूम, वाइड लैंस, कुछ विल्टर, बैटरी, चार्जर और एक बैग) खरीदने के बारे में सोच सकता था।
तब शायद पूरे भारत में ही व्यवसायिक डिजिटल कैमरों का चलन नहीं था। फोटाग्राफी मैनवल कैमरों और विडियोग्राफी साधारण या बीटाकैन से होती थी। इसके बाद मैंने अपनी मां से कुछ पैसे उधार लिए और दिल्ली के चांदनी चौक स्थित फोटो मार्केट से एक खुद कीकिट खरीद लाया। जो उस वक्त मुझे कुल 25 हजार रुपए में पड़ी थी।
दिन भर फोटो खिंचना और शाम को धर्मशाला में निढाल होकर सो जाना। यह क्रम करीब दो महीने चला। इस बीच मुझे अपनी पढ़ाई के मद्ïदेनजर वापस लौटना पड़ा। जो मेरा पहला उद्ïदेश्य था। प्रोफेशनल फोटाग्राफरों के साथ रहते हुए इस बीच में फोटाग्राफी की कई बारीकियां सीख चुका था।
इस पूरे दौरान न तो मुझे कुंभ की महत्ता की जानकारी थी न ही में कभी इतनी धार्मिक प्रवृत्ति का रहा हूं। एक मात्र उद्ïदेश्य था फोटाग्राफी सीखना और कुछ पैसे कमाना। जो मैंने पूरा किया।
दुनिया के कोने-कोने से आकार लोग मोक्ष प्राप्ति को गंगा स्नान कर गए। लेकिन मैं पूरे दो माह हरिद्वार में रहते हुए भी ऐसा नहीं कर पाया। न ही हमारे फोटोग्राफर साथियों के बीच कभी इस बात को लेकर चर्चा हुई। गंगा के प्रति हमेशा से मेरी अपार आस्था रही है, लेकिन यह प्रश्न आज भी जब मैं अपने-आप से पूछता हूं कि क्यों मैं ऐसा नहींं कर पाया तो उसका जवाब नहीं मिलता।
रात को जब तमाम घाट सुनसान हो जाते। दूसरे साथी इन घाटों पर बैठकर ही गंगाजी में आधे पांव डुबोकर मदिरापान करते और अपनी थकान उतारते। कई बार बियर का दौर चलता तो फ्रिज का काम भी गंगा के निर्मल जल से ही लिया जाता। इस पूरे आयोजन में मैं भी मदिरा पीने के अलावा बराबर का भागीदार बनता और माहौल का लुत्फ उठाता।
आज भी सोचता हूं तो बस सोचता ही रह जाता हूं-क्यों नहीं मैं भी उस भवसागर का तिल बन पाया, जिसमें सब तरने आए थे।

दूसरा साक्षात्कार
12 जनवरी 2010, दिन मंगलवार। मैं सीट पर बैठा खबरों का संपादन (अमर उजाला, देहरादून) कर रहा था। उसी वक्त संपादक आदरणीय निशीथ जोशी जी ने मुझे अगले दिन कवरेज के लिए हरिद्वार जाने का आदेश दिया। हालांकि अगले दिन मेरी छुट्ïटी थी और पहले से कुछ कार्यक्रम तय थे, लेकिन यह मेरे लिए शुअवसर था।
चूंकि अगले दिन 14 फरवरी यानी मकर संक्रांति को सदी के पहले कुंभ का पहला स्नान होने जा रहा था। मैं फोटोग्राफर नवीन कुमार सहित भारी बारिश के बीच 13 फरवरी की सुबह नौ बजे हरकी पैडी पर था। बारिश के बावजूद लोगों की भीड़ भोर से स्नान के लिए ब्रह्मïकुंड की ओर टूट रही थी। मैंने नवीन ने कहा काम शुरू करने से पहले गंगा जी को प्रणाम कर लिया जाए। इसके बाद हमने श्रद्धा केसाथ आचमन किया और दो मिनट गंगा के शीतल जल में खड़े होकर उसके स्पर्श का आनंद लिया।
पूरा दिन काम करने के बाद हमने हरिद्वार कार्यालय से स्टोरी फाइल की और फिर हम वापस आ गए। इस आपाधापी के बीच उस दिन हमें खाने का भी समय नहीं मिला। गंगा में स्नान करने की बात उस दिन भी दिमाग में नहीं आई। सुखद था तो इतना दिन भर की मेहनत अगले दिन पहले पन्ने पर बॉटम के रूप में नजर आई।

Saturday, April 17, 2010

Saturday, April 3, 2010

एक आंदोलन जो विश्वव्यापी मुहिम बन गया


'चिपको आंदोलन ’ के 36 साल पूरे होने पर विशेष
विनोद के मुसान
एक आंदोलन, जिसने विश्वव्यापी पटल पर धूम मचाई। पर्वतीय लोगों की मंशा और इच्छाशक्ति का आयाम बना। विश्व के लोगों ने अनुसरण किया, लेकिन अपने ही लोगों ने भुला दिया। एक क्रांतिकारी घटना, जिसकी याद में देश भर में चरचा, गोष्ठिïयां और सम्मेलन आयोजित होने चाहिए थे, अफसोस! किसी को सुध तक नहीं रही। हम बात कर रहे हैं विश्वविख्यात 'चिपको आंदोलन ’ की। 'पहले हमें काटो, फिर जंगल ’ के नारे के साथ 26 मार्च, 1974 को शुरू हुआ यह आंदोलन उस वक्त जनमानस की आवाज बन गया था। आंदोलन की सफलता अपनी परिणति पर पहुंची और सैकड़ों-हजारों पेड़ कटने से बच गए। लेकिन आज सवाल यह खड़ा होता है, क्या अब सब कुछ सुधर गया है? क्या हमें अब पेड़ों की जरूरत नहीं? या एक बार आंदोलित होने के बाद हम चैन की बंशी बजा रहे हैं।
यह आंदोलन उस वक्त इसी पर्वतीय क्षेत्र में शुरू हुआ था, लेकिन आज जब विकास के नाम पर पर्वतीय राज्य की रूपरेखा को एक आयाम देकर उत्तराखंड राज्य का गठन कर दिया गया, तब यहीं के लोग इसे भूल गए। कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को अगर छोड़ दिया जाए तो न ही आम आदमी को इसकी जानकारी थी और न ही सरकार के नुमाइंदों को। राज्य के राजनेताओं का तो कहना ही क्या। 26 मार्च को सत्तारूढ़ दल के नेता सत्र के दौरान विधायकों की संख्या गिनने में जुटे थे तो विपक्षी दल के नेता सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पटल पर रखने की तैयारी। ऐसे में भला उन्हें कहां याद रहता की आज चिपको आंदोलन की सालगिरह है।
आइए आपको इसकी पृष्ठïभूमि में ले चलते है, जहां से शुरू हुई थी एक मुहिम, जिसने देखते ही देखते न सिर्फ विश्वव्यापी रूप धारण कर लिया बल्कि राष्टï्रीय राजनीति में एक तूफान खड़ा कर दिया। हमेशा नमन की हकदार रहेगी वह महिला गौरा देवी जिसने इस मुहिम को न सिर्फ शुरू किया, बल्कि इसे इसके मुकाम तक पहुंचाया। 1925 में जोशीमठ से करीब 24 किलोमीटर नीती घाटी के लाता गांव के एक जनजातीय परिवार में जन्मी गौरा देवी का अपना जीवन खुद एक संघर्ष की गाथा है। 12 साल की उम्र में विवाह, 19 साल की उम्र में एक पुत्र को जन्म और 22 साल की उम्र में पति का स्वर्गवास। दुखों का पहाड़ झेलते हुए अशिक्षित होने के बावजूद इस महिला ने कभी हार नहीं मानी और अपने जीवन को उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां आज उसे पूरा विश्व सम्मान की नजर से देखता है। गौरा देवी और साथियों के संघर्ष का ही परिणाम था जो 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बना और केंद्र सरकार को पर्यावरण मंत्रालय का गठन करना पड़ा।
70 के दशक में जब सरकार पर्वतीय वनों को काटकर मोटा मुनाफा कमाना चाहती थी, उस वक्त मंडल-फाटा के जंगलों को बचाने से शुरू हुई मुहिम पैनखंडा ब्लाक के नीती घाटी के रैंणी के जंगलों तक फैल गई। गौरा देवी के साथ ऊमा देवी, अखा देवी, बारी देवी, मूसी देवी, रूपसा देवी पुसुली देवी, नोरती देवी नागी देवी जैसी सैकड़ों औरतों ने जैसे चंडी का रूप धारण कर लिया। उन्होंने समेट लिया उन पेड़ों का अपने आंचल में, जिन्हें वह अपने बच्चों की तरह प्यार करती थीं।
धीरे-धीरे यह मुहिम पूरे गढ़वाल से लेकर कुमाऊं मंडल तक फैलने लगी। लोग जुड़ते गए और कारवां बनता चला गया। 'पेड़ों पर हथियार उठेंगे, हम भी उनके साथ मरेंगे ’, 'लाठी-गोली खाएंगे, अपने पेड़ बचाएंगे ’ जैसे नारे पूरे पहाड़ की फिजा में गूंजने लगे। 1977 में जंगलों के कटान से उपजे जनाक्रोश का ही परिणाम नैनीताल क्लब को झेलना पड़ा। जनता ने उसे आग के हवाले कर प्रतिकार किया। इसके बाद सैकड़ों गिरफ्तारियां हुई, कई लोग जेल गए, लेकिन आंदोलन थमा नहीं। यह लोगों के हक-हकूक की ही लड़ाई नहीं थी, बल्कि एक ऐसी मुहिम थी, जिसमें विश्व कल्याण की भावना निहित थी।
चिपको की मुहिम के साथ और भी कई ऐसे नाम जुड़े हैं, जो विश्व पटल में इस आंदोलन से विख्यात हुए। पर्यावरणविद्ï सुंदर लाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ïट, धूम सिंह नेगी, विजय जड़धारी, कुंवर प्रसून, बचना देवी और कई लोग जो आज भी चाहते हैं कि फिर से एक चिपको आंदोलन शुरू किए जाने की जरूरत है। इन्हीं लोगों ने पेड़ों पर 'रक्षा सूत्र ’ बांधकर एक नए आंदोलन को जन्म दिया था। जिसमें टिहरी जिले की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
उस वक्त अगर सरकार अपनी मंशा में कामयाब हो जाती तो पर्वतीय क्षेत्रों में देवदार, कैल, बांज, रुई, मुटिंडा, अखरोट, पांगर, मशरूम, चंद्रा मोतिया और न जाने कितने औषधीय महत्व के पेड़ नष्टï हो चुके होते। हरियाली से लबालब आज के कई पहाड़ हमें किसी विधवा की सूनी मांग से प्रतीत होते।
आज जब पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रहा है। भविष्य में इसके खतरे पूरी पृथ्वी को लील लेना चाहते हैंं, ऐसे में हमें जरूरत है फिर से एक चिपको आंदोलन की। सामाजिक आंदोलनकारी चंडी प्रसाद भट्ïट, माटू जनकल्याण संगठन के संयोजक विमल भाई, गौरा देवी की प्रमुख साथी रही बाली देवी कहती हैं-आज के समय में जब विभिन्न परियोजनाओं खासकर बड़ी विद्युत परियोजनाओं से जल, जंगल और जमीन को हो रही क्षति के दुष्परिणाम बहुत ही घातक होंगे। हम अल्प समय के लिए मिलने वाली सुविधाओं के लिए प्रकृति से खिलवाड़ नहीं कर सकते। आज नहीं तो कल हमें इसके भयंकर दुष्परिणाम भुगतने होंगे। अगर हम आज नहीं चेते तो कल इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए।

Thursday, March 25, 2010

भारी पड़ेगी मां के गर्भ से छेड़छाड़

राजीव पांडेय

प्रकृति पर पूरी तरह निर्भर रहकर ही मनुष्य जीवित नहीं रह सकता यह अटूट सत्य है। जीने के लिए हमें कई बार प्रकृति के विपरीत जाकर भी काम करने पड़ते हैं। लेकिन इस सत्य को भी नहीं नकारा जा सकता कि प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ निश्चित रूप से जानलेवा होगी। पर, इन सबसे बेपरवाह प्रकृति के साथ बारबार बलात्कार करना मनुष्य की फितरत बन गई है।
विकास की आड़ में प्राकृतिक संतुलन बिगाडऩा मनुष्य अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने लगा है। इसकी गंभीरता इंसानों के बन रहे क्लोन से पता लगती है। सरोगेसी तकनीक ने मां-बेटे के बीच स्थापित माप-दंडों के मूल्य को शून्य कर दिया है। अब मां का गर्भाशय एक थैली बनकर रह गया है। पैसे के दम पर कोई भी कोख को किराये पर ले सकता है। भ्रूण हत्या की परिणति हम वर्ष 2005 में आई मनीष झा की फिल्म 'मातृभूमि ’ में देख चुके हैं। इन सबके बीच अब एक नया ट्रेंड विकसित हुआ है जो मनुष्य की विकृत हो चुकी मानसिकता की ओर संकेत करता है। यह चलन दक्षिण से चलकर उत्तर भारत के शहरों तक पहुंचा है। इसमें प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का कारण एक तरफ अंधविश्वास है तो दूसरी ओर डाक्टरों की पैसा कमाने की भूख। कई मां-बाप भू्रण के पुष्टï होने से पहले ही ऑपरेशन के जरिए उसे बाहर निकाल दे रहे हैं। कई मामलों में आधुनिक दवाइयों और इंजेक्शनों के माध्यम से प्रसव को रोक दिया जा रहा है। प्रसव का यह समय ज्योतिष से पूछकर नियत किया जाता है ताकि ग्रहों की चाल के अनुसार बच्चा पैदा हो और दुनिया पर राज करे। जबकि चिकित्सक इसे केवल इसलिए बढ़ावा दे रहे हैं क्योंकि ऑपरेशन के माध्यम से होने वाले प्रसव में उनकी कमाई सामान्य प्रसव की तुलना में 20 हजार रुपये से अधिक होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी चिकित्सकों की इस मनसा का खुलासा कर चुका है।
डब्लूएचओ की हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में डॉक्टरों द्वारा गर्भवती महिलाओं के प्रसव के लिए किए जाने वाले ’यादातर ऑपरेशन का मां और बच्चे की सेहत से कोई लेना-देना नहीं है यह केवल पैसा कमाने की तरकीब हैं। इसी का परिणाम है कि हर पांच में से एक प्रसव ऑपरेशन के जरिए किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007-08 में भारत, चीन, श्रीलंका, जापान और नेपाल समेत नौ एशियाई देशों में ऑपरेशन के जरिए प्रसव मेें 27 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भारत में यह वृद्धि 18 प्रतिशत है जबकि चीन में इस तरह के मामले से सबसे अधिक देखे गए हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में ऑपरेशन के जरिए प्रसव कराने की दर में पांच से 65 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। भारत में ऑपरेशन के जरिए प्रसव कराने की सूची में अव्वल हैं गुजरात, मध्य प्रदेश और दिल्ली जबकि सरोगेसी के सबसे अधिक मामले भी गुजरात में ही होते हैं। डब्लूएचओ के अनुसार ऑपरेशन से प्रसव कराने के 15 प्रतिशत के मान्य स्तर के ऊपर के मामले आपात स्थिति में ऑपरेशन की जरूरत के लिए नहीं, बल्कि पैसे बनाने के लिए किए जाते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भवती महिलाओं को इस तरीके से प्रसव से बचने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि सामान्य प्रसव की तुलना में इस प्रक्रिया में मातृ मृत्यु, शिशु मृत्यु, आईसीयू की नौबत आने के अलावा रक्त चढ़ाने आदि की समस्याएं आ सकती हैं। जबकि मां के गर्भ में पल रहे भ्रूण को परिपक्व होने से पूर्व निकालना या फिर दवाइयों के दम पर उसे रोक देना और भी घातक हो सकता है। इससे मां और बच्चे दोनों की जान के लिए खतरा बना रहता है। इस तरह पैदा हुए बच्चों को अक्सर सांस लेने में खासी दिक्कत होती है और एक परिपक्व शरीर न बन पाने के कारण कई बार वह आंख खोलने से पहले ही मौत के मुंह में होते हैं। पुरुष प्रधान समाज में मां की कोख केसाथ छेड़छाड़ की यह विकृति अब पूरे भारत में फैल रही है। करीब एक दशक पूर्व दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु से शुरू हुआ यह सफर अब उत्तर भारत केछोटे-छोटे शहरों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। देहरादून, कानपुर, लखनऊ जैसे शहरों में भी लोग इस तरह का दुस्साहसिक कदम उठाने से परहेज नहीं कर रहे हैं। यह वह शहर हैं जहां नियोनेटल केयर की सुविधा उपलब्ध नहीं है। नियोनेटल के जरिए कोख से बाहर भी बच्चे को विकसित किया जा सकता है। भारत केकुछ ही महानगरों में अभी यह सुविधा पूरी तरह उपलब्ध है लेकिन कोख छेड़छाड़ पूरे देश में हो रही है। जिसके लिए मां और बच्चे की जान को खतरे में डालने से भी लोग गुरेज नहीं कर रहे।
ऐसा नहीं कि गर्भ में भू्रण का पता लगाने की इच्छा नई है। यह रीत वैदिक काल से चली आ रही है। लेकिन तब मां की कोख से छेड़छाड़ नहीं की जाती थी। आयुर्वेद में इच्छित संतान की प्राप्ति के उपायों को पुंसवन कर्म कहा गया है। यह कर्म मां के गर्भ में भ्रूण के लिंग निर्धारण से पूर्व विशेष काल और विधि के अनुसार किया जाता था। इसमें स्त्री के लक्षणों को देखकर जड़ी-बूटी या अन्य प्रक्रियाओं के माध्यम से लिंग निर्धारण के प्रयास किए होते थे। महर्षि सुश्रुत और वाणभट्टï ने भी इस प्रकार के लक्षणों का वर्णन करते हुए लिखा है कि जिस स्त्री के दक्षिण स्तन में पहले दुग्ध की उत्पति हो, दक्षिण आंख भरी हो, जो दाहिने पैर को उठाकर चलती हो, जिसका मुख वर्ण प्रसन्न हो वह पुत्र उत्पन्न करेगी। जबकि इसके विपरीत लक्षण वाली स्त्री कन्या को जन्म देती है।
आधुनिक विज्ञान में यह शोध का विषय है। पर, यह तय है कि इस प्रक्रिया से मां और बच्चे के जीवन को कोई खतरा नहीं होता था। लेकिन आज आधुनिक चिकित्सा के गुमान, चिकित्सकों की पैसे की भूख और हमारे अंधविश्वास ने सारे नियमों को तोड़ गर्भ में हाथ डालने की कोशिश शुरू कर दी है। इसके गंभीर परिणाम विकृत मानव के रूप में हमारे सामने होंगे।

Saturday, March 20, 2010

आप बताओ कौन सा लोकतंत्र सच्चा है

मेरी उम्र 30 वर्ष होने को है। मैंने कक्षा 9 से शायद अखबार में खेल के अलावा अन्य पेज देखने शुरू किए। तभी से मैं पढ़ता और सुनता आ रहा हूं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस देश में सभी को अभिव्यक्ति की आजादी है। इसके बाद मैंने एमए प्रथम वर्ष की पढ़ाई राजनीति विज्ञान से कि तो कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य भारतीय लोकतंत्र के बारे में जाने। कई अन्य स्रोतों से भी लोकतंत्र के बारे में पढ़ा लेकिन अभी तक लोकतंत्र की महिमा को समझ नहीं पाया। अब यदि भारतीय परंपरा के लोकतंत्र को देखता हूं तो यह बड़ा ही लचिला लगता है। अभिव्यक्ति की आजादी देश में जरूर है लेकिन आदमी की औकात देखकर। लोकतंत्र में उसे ही जीने का मौका मिलता है जिसकी सत्ता में बेहतर पकड़ है या उसकी क्षमता इतनी है कि वह सरकार को हिला सके। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मनसे का राज ठाकरे है। शिवसेना का बाल ठाकरे है इनके लिए देश में पूरा लोकतंत्र है। हालांकि यह लोग खुद लोकतंत्र के हिमायती नहीं है। इसके अलावा भाजपा से जुड़े कुछ टट्पुंजिए छोटेमोटे राजनीतिक दल हैं जो किसी का भी सर कलम करने की धमकी दे सकते हैं। पर यह भारतीय लोकतंत्र की उदारता है कि इनकी सारी धमकियों को अभिव्यक्ति माना जाता है। इनकी सुरक्षा भी उन्हीं लोगों केधन से सरकार करती है जिनका सर कलम करने का फरमान यह लोग जारी करते हैं। इसकेविपरीत लोकतंत्र का दूसरा पहलू भी है। इसमें उन कर्मचारियों पर एस्मा लगा दिया जाता है जो अपनी मांगों को लेकर शांति पूर्वक धरना प्रदर्शन करते हैं। इसकी एक बानगी हाल के दिनों उत्तराखंड में दिखाई दी यह उस सरकार ने किया जिसके मुखिया एक तथाकथित साहित्यकार हैं। यह भी लोकतंत्र है। इसके अलावा हालिया दिनों में इस लोकतंत्र में एक और चीज तेजी से बढ़ी है। सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले गरीबों के हक की लड़ाई में उनका साथ देने वालों को अब नक्सली कहा जाता है। जो लोग देश से गरीबी मिटाने के लिए प्रयासरत हैं उन्हें माओवादी कह उन पर रासुका लगाकर जेल में ठूंसने की प्रक्रिया जारी है। जो इनका समर्थन करता है उसकी हालत बिनायक सेन या हिमांशु जैसी कर दी जाती है। अब आप बताईए कौन सा लोकतंत्र सच्चा है और हम किसको मजबूत करने के लिए प्रयास करें।


Thursday, March 11, 2010

बाघों के संरक्षण को आगे आया चीन


विनोद के मुसान
बाघों को बचाने के लिए हमारे पड़ोसी देश चीन ने पहली बार भारत के साथ कदम मिलाने की पहल की है। इसके तहत चीन ने बाघों के अंगों की तस्करी रोकने के लिए कड़े फरमान जारी किए हैं। माना जा रहा है कि चीन के इस कदम से बाघों के संरक्षण में बड़ी मदद मिलेगी।
ऐसा पहली बार हुआ कि चीन के राज्य वन्य प्रशासन ने बाघों के प्रजनन की सुविधाओं में सुधार करने पर भी खास जोर दिया है। दरअसल भारत का आरोप है कि चीन में बाघों के अवैध प्रजनन की वजह से उनके अंगों की तस्करी बढ़ती है। चीन के इस कदम को सकारात्मक दृष्टिï से देखा जाना चाहिए। चीन के बाघों के अंगों के अवैध कारोबार पर रोक लगाने और दिशा-निर्देश जारी करने के बाद इस दिशा में जरूर कामयाबी मिलेगी।
इस साल चीन में बाघ वर्ष मनाया जा रहा है। हालांकि चीन ने इस आरोप को खारिज किया है। सरकार बाघों के संरक्षण के लिए कई कदम उठा रही है। चीन की इस पहल से भारत को बाघों के संरक्षण में खास मदद मिलने की उम्मीद जगी है।
देश में बाघों की हालत पर
- 2008 की गणना के अनसार देश में बाघों की संख्या 1411
- पिछले सात साल में 60 फीसदी संख्या घटी
- पूरे देश में 38 प्रोजेक्ट टाइगर अभयारण्य हैं
- 17 अभयारण्यों की हालत खराब
- 832 बाघों का शिकार 1994 से 2007 के बीच
- 59 बाघ मारे गए 2009 में, 15 का शिकार

Saturday, March 6, 2010

सूचना विभाग ऐसे भी तो भेज सकता है विज्ञप्ति

विनोद के मुसान
सूचना तकनीक के इस युग में जब आम आदमी इंटरनेट के संजाल को जेब में रखकर घूम रहा है, ऐसे में उत्तराखंड सरकार का सूचना विभाग शायद इससे अछूता है। तभी तो आज भी अखबार के दफ्तरों में रोज शाम को विभाग की एक गाड़ी मय दो कर्मचारियों के साथ माननीयों के छायाचित्र और प्रेस विज्ञप्ति देने पहुंच जाती है। व्यवस्था का आलम देखिए, जो काम मात्र कुछ रुपए और चंद सेकेंडों में किया जा सकता है, उसके लिए प्रदेश की सरकार न सिर्फ अधिक पैसा खर्च करती है, बल्कि राजकीय संसाधनों का भी दुरुपयोग किया जा रहा है।
आज भी प्रदेश का सूचना विभाग पुराने ढर्रे पर काम कर रहा है। डिजिटल तकनीक के इस युग में मैनवल कैमरों का प्रयोग किया जा रहा है। प्रेस विज्ञप्ति ई-मेल से भेजने के बजाए बकायदा एक राजकीय वाहन से भेजी जाती हैं। जिसमें अमूमन एक ड्राइवर और दो कर्मचारी साथ होते हैं। जबकि यह काम इंटनेट के माध्यम से आसानी से समय की बचत केसाथ और बहुत कम पैसे में पूरे किए जा सकते हैं।
मैं यहां पर बहुत ज्यादा ब्योरा नहीं देना चाहूंगा कि इसमें प्रतिमाह या सालभर में कितना खर्च होता है, लेकिन यह तय है कि इससे समय, पैसा और मानव संसाधनों का दुरुपयोग होता है।
राज्य के नीति-नियंता इस ओर ध्यान दें तो बहुत ज्यादा नहीं तो थोड-बहुत बचत हो सकती है। अगर इस साश्वत सत्य को दिमाग में रखें- बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है।

Thursday, March 4, 2010

बाजार में बिकती 'भीड़ ’

विनोद के मुसान
भौतिकवाद और बाजारीकरण के इस युग में बाजार में बिकने लगी भीड़! क्या बात कर रहे हो भाई? आलू-प्याज समझा है क्या? माना कि बाजार में बहुतायत मिलती है यह भीड़, लेकिन बिकती भी है भीड़! कहां? क्या कहा! बाजार में! इनकी मंडी कहां लगती है? सरेआम, सरेराह, यहां-वहां, जहां-तहां, हर जगह, गली-मुहल्लों में, गांवों में, शहरों में जहां चाहोगे उपलब्ध हो जाएगी। लेकिन इसे इतनी भी 'आम ’ मत समझना। 'आम ’ को 'खास ’ बनाने वाली ये नाचीज सी 'चीज ’, है बहुत ही खास। जिस तरफ ढल जाए, उसका बेड़ापार कर देती है। बस दाम चुकाने के साथ मौका भुनाने वाला चाहिए। हर मौके पर उपलब्ध हो जाएगी यह भीड़।
कहते हैं, पहले ऐसी नहीं थी ये भीड़। जनम-मरण, खुशी-गम में यूं ही शामिल हो जाती थी ये भीड़। बड़े-बड़े किलों को फतह कर जाती थी यह भीड़। एकजुट होकर किसी को गद्ïदी पर बिठा और किसी को गद्ïदी से उतार देती थी ये भीड़। एकता की ऐसी मशाल जलाई की देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद करा गई ये भीड़।
वक्त बदला, जरूरतें बदली और बदल गई सोच। इसके बाद धीरे-धीरे बहुत नकचढ़ी सी हो गई ये भीड़। आलम यह है कि आज बिना दाम किसी को घास ही नहीं डालती यह भीड़।
अब तो कुछ लोगों ने इसके अच्छे-खासे दफ्तर भी खोल लिए हैं। इसके बिजनेस में सेल्समैन ही नहीं कांट्रेक्टर से लेकर सप्लायर तक की पोस्ट ईजाद हो गई हैं। आज किसी के परिणय सूत्र में बंधने से लेकर देश की संसद तक को प्रभावित करती है यह भीड़।
राज्य की राजधानी में बैठा 'मैं ’, उस दिन देखता ही रह गया भीड़। क्या नजारा था, रेलम-पैला था, एक के पीछे एक, दूर तलक बस दिखाई दे रही थी भीड़। पूछा, तो पता चला एक 'असामी ’ पार्टी ने जुटाई है आज यह भीड़। विस में सत्र शुरू हो चुका है। विपक्षी पार्टी ने परंपरा का निर्वाहन पूरा करने के लिए घिराव की तैयारी के लिए जुटाई है यह भीड़।
दूर से बहुत खुबसूरत सी नजर आ रही थी यह भीड़। मुखाने पर चमकते चेहरे थे, चटक सफेद कुर्ते-पजामे और सिर पर बेदाग सी दिखाई दे रही वही सफेद टोपी थी। गिले-शिकवे से भरे नारे भी थे। इसी भीड़ को पीछे छोड़ आगे जाने का जोश था। लेकिन पीछे और पीछे... दूर तलक मुरझाई हुई सी नजर आ रही थी यह भीड़। हाथों में झंडे-डंडे लिए सुस्ताई हुई सी थी यह भीड़। थोड़ा करीब जाकर देखा तो पता चला 'बिकी ’ हुई थी यह भीड़।
'पैसा फेंकों-तमाशा देखो ’ आज कुछ ऐसी हो गई है यह भीड़। 'वक्तिया प्रारूप ’ में ढलकर अपना 'स्व-स्वरूप ’ खो गई है यह भीड़। अपनी ताकत का एहसास होने के बाद भी असहाय सी हो गई है यह भीड़। नजरों का फेर नहीं हकीकत में कहीं अपने में ही खो गई यह भीड़।

Sunday, August 2, 2009

विरोध का यह कौन सा तरीका है

विनोद के मुसान
विरोध के सौ तरीके हो सकते हैं। लेकिन राष्ट ्रीय अभियान को धता बताकर अपने बच्चों को कुछ लोग पोलियो की दवा सिर्फ इसलिए नहीं पिलाते की उनके गांव में सड़क नहीं बनी या उनके यहां बुनियादी सुविधाआें का अभाव है। तो इसे आप या कहेंगे?
उत्तर-प्रदेश में इस तरह के 'विरोध` आम बात होती जा रही है। अशिक्षा का अंधेरा और जागरूकता की कमी ने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों को उजाले से दूर रखा है। गरीबी रेखा से नीचे दयनीय जीवन व्यापन कर रहे ये लोग नहीं जानते कि ऐसा करके वे कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं। इसे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना नहीं तो और या कहेंगे। पहले ही एक विशेष संप्रदाय के लोग (विशेषकर उत्तर-प्रदेश में) कुछ भ्रांतियों को आधार बनाकर पोलियो ड्राप का विरोध करते रहे हैं, लेकिन अब स्थिति और भयावह होती नजर आ रही है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश के प्रशासनिक ढांचे में तमाम 'होल` मौजूद हैं। यहां व्यवस्थाएं हैं, योजनाएं हैं, नीतियां हैं, लेकिन इन्हें क्रियान्वयन करने वाली तमाम शि तयां भ्रष्ट ाचार केदलदल में गले-गले तक दबी हैं। ऐसे में संचालित हो रही योजनाआें का आधा-अधूरा लाभ भी संबंधित लाभार्थियों को नहीं मिल पा रहा है। 
इन हालात में यदि बची-कुची व्यवस्था को भी हम अपने हाथों चौपट कर देंगे, तो कैसे काम चलेगा। देश के नौनिहाल स्वस्थ रहें, वे आगे चलकर एक जिम्मेदार नागरिक बने, इस मंशा को पूरा करने के लिए सरकार तमाम योजनाएं संचालित करती है। राष्ट ्रीय जागरूकता पोलियो अभियान भी इसी मुहिम का एक हिस्सा है। उत्तर-प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी समस्याआें को आगे रखकर अभियान का विरोध तेजी से जोर पकड़ता जा रहा है। यह राष्ट ्रीय चिंता का विषय है। देश के नीति-नियंताआें को इस विषय में गंभीरता से सोचना पड़ेगा। इन क्षेत्रों में जागरूकता के लिए उन बुनियादी बातों को भी जानना जरूरी है, जिनके कारण लोग ऐसा कदम उठा रहे हैं। नहीं तो यह अभियान एक मजाक बनकर रह जाएगा और हमारे बच्चे जागरूकता केअभाव में एक ऐसा जीवन जीने को मजबूर होंगे, जो उन्होंने कभी भी अपने लिए नहीं चुना होगा।