विनोद के मुसान
टीवी न्यूज चैनल की स्क्रीन से खबरें सिरे से गायब हैं। अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने वाले तमाम न्यूज चैनलों के पास खबरों का ऐसा टोटा है कि वे हांफते फिर रहे हैं। फिर भी प्रतिस्प्रर्धा की अंधी दाै़ड में बेशर्म होकर अपने को सर्वश्रेष्ठ कहलाने से नहीं हिचकते हैं।
लोग सुबह उठते हैं, ताजातरीन होकर। टीवी का स्विच ऑन करते हैं, यह सोचकर की देश दुनिया की खबरों से रू-ब-रू हो सकें। लेकिन, इससे इतर उन्हें जानकारी मिलती है, बीती रात कौन से सीरियल में या घटित हुआ। नच बलिए में किस ने कौन से लटके-झटके दिखाए और हंसी के फूहड़ शो में पूरा शो खत्म हो जाने केबाद भी किसी को हंसी नहीं आई। छोटे उस्ताद में गंगू बाई ने किसके घर में झाड़ू लगाई। कौन से हिरो-हिरोइन ने इन दिनों किस कंपनी का प्रोड ट लांच किया। और इस सबकेबाद भी टाइम बचा तो आपको इसी लोक में पाताल लोक की सैर भी करा दी जाती है। जब दिखाने को कुछ न हो तो सदाबहार 'आतंकवाद` तो है ही। यह ऐसा विषय है, जिसके कभी भी चला दो। एजेंसी से उठाई हुई ि लप को मिर्च-मसाला लगाकर ऐसे पेश किया जाता है, जैसे दुनिया की सबसे बड़ी खबर आज चैनल के हाथ लग गई हो। खबरों के नाम पर जो भाै़ंडा खेल चैनल वाले खेल रहे हैं, इसने रही-सही पत्रकारिता का भी सत्यानाश कर दिया है। चैलनों पर चलने वाली खबरों को देखकर कोफ्त होती है, सिर दर्द करने लगता है। आम शख्स आज न्यूज चैनलों केबारे में अपनी बेबाक रखता है तो उसकेमुख से कभी अच्छी बात नहींं निकलती। वैसे भी पत्रकारिता के इस पवित्र पेशे में कैसे-कैसे लोगों की गुसपैठ हो चुकी है, यह बात किसी से छुपी नहीं है।
ईमानदारी से सोचो सौ कराे़ड से ज्यादा आबादी वाले इस देश में या बारह घंटे की खबरें नहीं जुटाई जा सकती। चलो मान लिया आप चौबीस घंटे केन्यूज चैनल हैं, आपको हर व त कुछ न कुछ दिखाना है। लेकिन खबरों केनाम पर जो कुछ दिखाया जा रहा है, या वह उचित है। बासी ही सही लेकिन खबरें तो दिखाओ। चैनल वालों को लग रहा है, लोगों को फूहड़ हंसी वाले शो दिखाकर वे भी वे अपनी टीआरपी बढ़ा रहे, लेकिन ऐसा कब तक चलेगा।
Saturday, March 28, 2009
Tuesday, March 17, 2009
लल्लन टॉप चैनल
अशोक मिश्र
शाम को थका-मांदा घर पहुंचकर टीवी ऑन किया। चैनल 'लल्लन टॉप` पर खबरें प्रसारित हो रही थीं। समाचार वाचिका भानुमती की सुरीली आवाज गूंज रही थी, 'लल्लन टॉप` की खास पेशकश...दौलतपुर के एक गांव में गाय ने एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया,...दौलतपुर की धरती ने आज उस समय इतिहास रच दिया, जब दौलतपुर के एक गांव रमईपुरवा में एक गाय ने तीन बछियों को एक साथ जन्म दिया। तीनों बछिया स्वस्थ हैं। उनकी देखभाल जिला मुख्यालय से आई डॉ टरों की एक टीम कर रही है। कैमरामैन के साथ हमारे संवाददाता चंद्रबख्श मौके पर पहुंच चुके हैं। हम आपको फिर याद दिला दें कि दौलतपुर के गांव रमईपुरवा में बलिराम की गाय कबरी ने एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया है...आइए, हम अपने संवाददाता चंद्रबख्श जी से पूछते हैं कि वहां का या माहौल है?`
स्क्रीन पर माइक संभाले चंद्रबख्श जी नजर आते हैं। भानुमती कहती है, 'चंद्रबख्श जी, आप हमारे दर्शकों को बताएं कि वहां का या माहौल है? तीन बछियों को जन्म देने के बाद गाय कैसा महसूस कर रही है?`
चंद्रबख्श समाचार आगे बढ़ाते हैं, 'भानुमती, दौलतपुर के लोग सुबह से ही पटाखे फाड रहे हैं। गाय भी काफी खुश है। आप देख सकते हैं कि गाय इस समय हरा चारा खा रही है। उसके चेहरे पर प्रसन्नता और गर्व की झलक साफ देखी जा सकती है। उसने दौलतपुर के इतिहास में एक सुनहरा पन्ना जो जाेडा है। आइए, बात करते हैं गाय के मालिक बलिराम जी से।,`
स्क्रीन पर झ कास कुर्ता-पायजामा पहने बलिराम के साथ चंद्रबख्श प्रकट होते हैं। चंद्रबख्श पूछते हैं, 'बलिराम जी, या आपको पहले से उम्मीद थी कि आपकी गाय तीन बछियों को जन्म देगी?` बलिराम जी मंूछों पर ताव देते हुए कहते हैं, 'तीस साल पहले कबरी की दादी ने भी एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया था। इसकी मां भूरी ने भी दो बछड़ों को जन्म दिया था। हमें पूरी आशा थी कि यह भी कोई उपलब्धि जरूर हासिल करेगी।`
इसके बाद कैमरा बलिराम के चेहरे से पैन होता हुआ कबरी तक जाता है। कुछ देर तक चारा खाती कबरी और गांव में नाचती-गाती भीड़ को दिखाकर चंद्रबख्श विदा हो जाते हैं। स्क्रीन पर भानुमती का चेहरा नमूदार होता है। वह कहती हैं, 'हम अपने दर्शकों को ले चलते हैं दिल्ली स्टूडियो, जहां मौजूद हैं प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एमएनए सुब्रमण्यम राधास्वामी जी। चलिए, उनसे पूछते हैं कि इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर या प्रभाव पड़ेगा?` राधास्वामी पहले खखारकर गला साफ करते हैं, फिर बोलते हैं, 'मैं समझता हूं कि इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। हां, बलिराम की विकास दर देश के विकास दर से थाे़डा ज्यादा रहेगी।` भानुमती एक बे्रक लेकर स्क्रीन से गायब हो जाती है। मैं भी टीवी बंद कर चादर आे़ढकर सो जाता हूं।
(अशोक जी का यह लेख 'अमर उजाला` 16 मार्च, 2009 के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है।)
साभार-अमर उजाला
शाम को थका-मांदा घर पहुंचकर टीवी ऑन किया। चैनल 'लल्लन टॉप` पर खबरें प्रसारित हो रही थीं। समाचार वाचिका भानुमती की सुरीली आवाज गूंज रही थी, 'लल्लन टॉप` की खास पेशकश...दौलतपुर के एक गांव में गाय ने एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया,...दौलतपुर की धरती ने आज उस समय इतिहास रच दिया, जब दौलतपुर के एक गांव रमईपुरवा में एक गाय ने तीन बछियों को एक साथ जन्म दिया। तीनों बछिया स्वस्थ हैं। उनकी देखभाल जिला मुख्यालय से आई डॉ टरों की एक टीम कर रही है। कैमरामैन के साथ हमारे संवाददाता चंद्रबख्श मौके पर पहुंच चुके हैं। हम आपको फिर याद दिला दें कि दौलतपुर के गांव रमईपुरवा में बलिराम की गाय कबरी ने एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया है...आइए, हम अपने संवाददाता चंद्रबख्श जी से पूछते हैं कि वहां का या माहौल है?`
स्क्रीन पर माइक संभाले चंद्रबख्श जी नजर आते हैं। भानुमती कहती है, 'चंद्रबख्श जी, आप हमारे दर्शकों को बताएं कि वहां का या माहौल है? तीन बछियों को जन्म देने के बाद गाय कैसा महसूस कर रही है?`
चंद्रबख्श समाचार आगे बढ़ाते हैं, 'भानुमती, दौलतपुर के लोग सुबह से ही पटाखे फाड रहे हैं। गाय भी काफी खुश है। आप देख सकते हैं कि गाय इस समय हरा चारा खा रही है। उसके चेहरे पर प्रसन्नता और गर्व की झलक साफ देखी जा सकती है। उसने दौलतपुर के इतिहास में एक सुनहरा पन्ना जो जाेडा है। आइए, बात करते हैं गाय के मालिक बलिराम जी से।,`
स्क्रीन पर झ कास कुर्ता-पायजामा पहने बलिराम के साथ चंद्रबख्श प्रकट होते हैं। चंद्रबख्श पूछते हैं, 'बलिराम जी, या आपको पहले से उम्मीद थी कि आपकी गाय तीन बछियों को जन्म देगी?` बलिराम जी मंूछों पर ताव देते हुए कहते हैं, 'तीस साल पहले कबरी की दादी ने भी एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया था। इसकी मां भूरी ने भी दो बछड़ों को जन्म दिया था। हमें पूरी आशा थी कि यह भी कोई उपलब्धि जरूर हासिल करेगी।`
इसके बाद कैमरा बलिराम के चेहरे से पैन होता हुआ कबरी तक जाता है। कुछ देर तक चारा खाती कबरी और गांव में नाचती-गाती भीड़ को दिखाकर चंद्रबख्श विदा हो जाते हैं। स्क्रीन पर भानुमती का चेहरा नमूदार होता है। वह कहती हैं, 'हम अपने दर्शकों को ले चलते हैं दिल्ली स्टूडियो, जहां मौजूद हैं प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एमएनए सुब्रमण्यम राधास्वामी जी। चलिए, उनसे पूछते हैं कि इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर या प्रभाव पड़ेगा?` राधास्वामी पहले खखारकर गला साफ करते हैं, फिर बोलते हैं, 'मैं समझता हूं कि इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। हां, बलिराम की विकास दर देश के विकास दर से थाे़डा ज्यादा रहेगी।` भानुमती एक बे्रक लेकर स्क्रीन से गायब हो जाती है। मैं भी टीवी बंद कर चादर आे़ढकर सो जाता हूं।
(अशोक जी का यह लेख 'अमर उजाला` 16 मार्च, 2009 के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है।)
साभार-अमर उजाला
Sunday, March 15, 2009
राजनीति में एंट्री
विनोद के मुसान
रामजी भाई गांव वाले इन दिनों काफी परेशान हैं। यूं तो उनकी परेशानी की वजह कुछ खास नहीं, लेकिन समस्या देशहित के साथ उनके कैरियर से जुडी है। व्यवस्था में रामजी भाई का योगदान मात्र इतना है कि वर्ष दर वर्ष किसी न किसी चुनाव में वे अपना कीमती मत 'दान` कर देते हैं। यूं तो उनका यह दान बहुत बड़ा है, लेकिन उन्हें लगता है मात्र दान कर लेने भर से उनकी और देश की समस्याएं हल होने वाली नहीं हैं। इसलिए पिछले दिनों उन्हें कुछ नया करने की सुझी और उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाने का निर्णय ले लिया।
आम आदमी का लेबल लिए रामजी भाई भले ही 'आम` हों, लेकिन उनमें वह सारी काबिलियत मौजूद हैं, जो उन्हें आम से खास बना सकती हैं। लेकिन व्यवस्था से अपरिचित जब उनका सामना सच्चाई से हुआ तो सारी की सारी योजनाएं धरी रह गइंर्।
रामजी भाई चाहते थे कि वे जनता की बीच जाकर देश की सर्वोच्च संस्था से जुड देशहित में योगदान दें। लेकिन, यहां पर आकार वे फंस जाते हैं।
उनके पास राजनीति में आने के लिए न तो किसी फिल्मीस्तान यूनिर्वसिटी की डिग्री है और न वे गुल्ली-डंडा केअलावा कभी क्रिकेटिया रंग में रंग पाए। गांव में रहते हुए उन्हें भाईगिरी करने का भी मौका नहीं मिला। बस नाम के ही 'रामजी भाई` बनकर रह गए। अब भला देश की समस्याएं हल कैसे हों, यही चिंता उन्हें आजकल दिन रात खाए जा रही है। इन दिनों रामजी भाई अपने गैर राजनीतिक खानदान को कोसने से भी बाज नहीं आते। दादा-नाना, चाचा-ताऊ, मामा-फूफा कोई तो होता, जो भवंर फंसी उनकी नैया का इस व त खेवनहार बनता। राजनीति केमैदान में उनका खानदान हमेशा से 'सफाच्चट` ही रहा। जिसका उन्हें इस दिनों खासा दुख है।
आर्थिक तंगी से जूझ रहे रामजी भाई की बीते दिनों की गई समाज सेवा भी काम नहीं आ रही। बुरे कर्मों की बाढ़ में लोग अच्छे काम करने वाले को किस कदर भूल जाते है, इसका अहसास रामजी भाई को इन दिनों खूब हो रहा है। वोट बैंक की राजनीति का आधुनिक 'विकृत` चेहरा देख वे हैरान हैं। टिकट से पहले नोट, जातिगत समीकरण और सेलिब्रिटी लेबल के अलावा तमाम दूसरे दाव-पेचों से उनकी झोली बिल्कुल खाली है। आमोखास बनने का कोई भी रास्ता उन्हें दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में उनकी चिंता लाजिमी है।
आखिर उनकी जुगत उनके साथ देशहित से जु़डी है। रामजी भाई बड़ा सोचते लेकिन बौनी व्यवस्था के आगे उनके कदम लड़खड़ाने लगते हैं। आखिर, हैं तो वह आम आदमी ही। जिसका कोई पूछनहार नहीं होता। कई तरह की जुगत लगाने के बाद भी जब रामजी भाई को कोई प्लेटफार्म नहीं मिल रहा तो वे अब इस क्षेत्र में आने से पूर्व अलविदा कहने की तैयारी कर रहे हैं।
Tuesday, November 18, 2008
Extra Spinner for 3rd ODI?
Yuvraj Singh smashed back-to-back centuries to help India take a 2-0 lead after the first two matches in the seven-match ODI series against England on Monday. While England's bowlers had no answer to Yuvraj's brilliance, their batsmen came a cropper in both matches against the Indian bowlers.
With India sitting pretty, and the Kanpur pitch, the venue for the third ODI, expected to assist spinners, should Pragyan Ojha replace left-armer R P Singh, who has so far looked quite rusty? Or should India retain the winning combination for Thursday's match and not allow England a chance to stage a comeback?
What should the playing eleven for the third ODI be? Be the selector, pick your eleven.
Mahendra Singh Dhoni (captain), virender Sehwag, Yuvraj Singh, Gautam Gambhir, Suresh Raina, Rohit Sharma, Virat Kohli, Yusuf Pathan, Murali Vijay, Harbhajan Singh, Zaheer Khan, Munaf Patel, Ishant Sharma, R P Singh, Pragyan Ojha.
With India sitting pretty, and the Kanpur pitch, the venue for the third ODI, expected to assist spinners, should Pragyan Ojha replace left-armer R P Singh, who has so far looked quite rusty? Or should India retain the winning combination for Thursday's match and not allow England a chance to stage a comeback?
What should the playing eleven for the third ODI be? Be the selector, pick your eleven.
Mahendra Singh Dhoni (captain), virender Sehwag, Yuvraj Singh, Gautam Gambhir, Suresh Raina, Rohit Sharma, Virat Kohli, Yusuf Pathan, Murali Vijay, Harbhajan Singh, Zaheer Khan, Munaf Patel, Ishant Sharma, R P Singh, Pragyan Ojha.
Thursday, November 6, 2008
उलझन
राह में बिखरे थे फूल तुम्हारे
तुमने कांटे यों चुन लिए
कभी उनसे तो पूछा होता
या वो भी चुभन महसूस करते हैं
आंखों से यूं न बहाओ आस का दरिया
देखो कहीं इसमें कोई डूब न जाए
चले ही यों जाते हो उस राह पर
जहां मंजिल का पता नहीं
या तुमने पीछे मुड़कर देखा है
कोई तुम्हारे साथ है भी या नहीं
शाम ढले तो घर चले आना
ये सोच कर कि कल फिर जाना है
कभी अकेले तो कभी
यादें उनकी साथ लेकर
फिर वापस आना है
तुमने कांटे यों चुन लिए
कभी उनसे तो पूछा होता
या वो भी चुभन महसूस करते हैं
आंखों से यूं न बहाओ आस का दरिया
देखो कहीं इसमें कोई डूब न जाए
चले ही यों जाते हो उस राह पर
जहां मंजिल का पता नहीं
या तुमने पीछे मुड़कर देखा है
कोई तुम्हारे साथ है भी या नहीं
शाम ढले तो घर चले आना
ये सोच कर कि कल फिर जाना है
कभी अकेले तो कभी
यादें उनकी साथ लेकर
फिर वापस आना है
अंतर्मन
यूं ही अंतर्मन में डूबा था एक दिन ये मन
कुछ अजीब सी उलझन लिए
तभी पीछे से किसी ने आवाज दी
लगा जैसे कोई अपना ही है
पीछे मुड़कर देखा
तो कोई न था
अपनी ही परछाई खड़ी थी
वही विशालकाय रूप लिए
सम्मोहन जैसा कुछ न था
फिर भी साथ थी वह मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
और मेरे साथ जुड़े होने का अहसास
अंतर्मन की उलझन
मैं और मेरी परछाई
तीनो साथ होकर भी
मानो अकेले थे
फिर करवां भी गुजर गया
सामने से मेरे
और मैं तनहा रहा खड़ा
जब तक परछाई थी साथ मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
सन्नाटा बढ़ता चला गया
और वह अंर्तध्यान हो गई
फिर वही संकोच लिए
मैं, मेरी परछाई और वह संन्नाटा
कुछ अजीब सी उलझन लिए
कुछ अजीब सी उलझन लिए
तभी पीछे से किसी ने आवाज दी
लगा जैसे कोई अपना ही है
पीछे मुड़कर देखा
तो कोई न था
अपनी ही परछाई खड़ी थी
वही विशालकाय रूप लिए
सम्मोहन जैसा कुछ न था
फिर भी साथ थी वह मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
और मेरे साथ जुड़े होने का अहसास
अंतर्मन की उलझन
मैं और मेरी परछाई
तीनो साथ होकर भी
मानो अकेले थे
फिर करवां भी गुजर गया
सामने से मेरे
और मैं तनहा रहा खड़ा
जब तक परछाई थी साथ मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
सन्नाटा बढ़ता चला गया
और वह अंर्तध्यान हो गई
फिर वही संकोच लिए
मैं, मेरी परछाई और वह संन्नाटा
कुछ अजीब सी उलझन लिए
यादें
न जाने यों होता है यूं जिंदगी के साथ
अचानक ये मन किसी के जाने के बाद
करे फिर उसकी याद
उसकी छोटी-छोटी सी बात
लम्हें गुजर जाते हैं, यादें रह जाती हैं
मासूम से चेहरे की दबी सी हंसी
आती है याद
उनके जाने के बाद
उनकी छोटी-छोटी सी बात
अचानक ये मन किसी के जाने के बाद
करे फिर उसकी याद
उसकी छोटी-छोटी सी बात
लम्हें गुजर जाते हैं, यादें रह जाती हैं
मासूम से चेहरे की दबी सी हंसी
आती है याद
उनके जाने के बाद
उनकी छोटी-छोटी सी बात
Friday, October 31, 2008
ये कैसी संस्कृति, ये कैसा विस्तार
विनोद के मुसानभारतीय संस्कृति में धर्म का बड़ा स्थान है। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म के अनुसार जीवनव्यापन करने, उसकी रक्षा करने और उसके विस्तार का अधिकार प्रदत्त किया है। यहां तक तो ठीक है, लेकिन दि कत तब आती है, जब संविधान में दिए गए इस अधिकार का लोग दुरुपयोग करने लगते हैं, जिससे दूसरे कई लोगों को दि कत होती है। बात 'धर्म` से जु़डी होती है, इसलिए कोई खुलकर विरोध भी नहीं कर पाता है। लेकिन बापू के इस देश में ऐसा नहीं होना चाहिए, जैसा कि वर्तमान में हो रहा है।
मैली होती गंगा : गोमुख से निकलने वाली निर्मल और स्वच्छ गंगा हरिद्वार के बाद अपना रंग बदल देती है। या आपने कभी सोचा है, ऐसा यों होता है। यकीनन उसमें जगह-जगह सीवरेज और फैि ट्रयों से निकलने वाला गंदा पानी मिल रहा है। लेकिन, गंगा में आस्था रखने वाले उसके भ त या कर रहे हैं। उसे साफ रखने के बजाय उसे और गंदा कर रहे हैं। पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद की पॉलीथीन, बच्चे के मुंडन के बाद उसके बाल, साथ में लाई गई अन्य गंदगी गंगा में बहा दी जाती है। नहाने के बाद मैले कपड़े उसमें निचाे़ड दिए जाते हैं। एक कुप्रथा देखिए-पता नहीं किस मूर्ख ने इसकी शुरूआत की-ऋषिकेश में राम झूला के पास एक घाट है, जहां लोग नहाने के बाद अपने अंडरवियर छाे़ड जाते हैं। पूछने पर आस-पास बैठे पंडे बताते हैं, ऐसा करने से आदमी पूरी तरह शुद्ध हो जाता है। लेकिन, वहां घाट पर बिखरे सैकड़ों अंडरवियर को देखकर मन खिन्न हो जाता है। गंगा हमारी मां के समान है, लेकिन उसके बेटों को कौन समझाए कि बेटा अब तुम जवान हो गए है। कम से कम नहाने के बाद अपना अंडरवियर तो संभाल लो। या अब भी इसे मुझे ही धोना पड़ेगा।
नगर कीर्तन : आप घर से किसी जरूरी काम के लिए निकले और रास्ते में आपको मिल गया नगर कीर्तन। सड़कें जाम। ट्रैफिक का बुरा हाल। पुलिस वालों द्वारा अमुक चौराहे पर आपको तब तक रोके रखा जाता है, जब तक की पूरा नगर कीर्तन न गुजर जाए। इस दौरान ट्रैफिक में कोई मरीज भी फंसा होता है तो किसी की बस या ट्रेन छूटने वाली होती है। इतना ही नहीं इस दौरान नगर कीर्तन के साथ गुजरने वाला जत्था अपने पीछे सड़कों पर छाे़ड जाता है तमाम गंदगी। जिससे साफ करने वाला कोई नहीं। नगर कीर्तन का स्वागत करने वाले अपने श्रद्धा जताने को जगह-जगह लंगर तो लगा देते हैं, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं देते की पीछे छूटने वाली गंदगी को कौन साफ करेगा। खासकर के पंजाब में यह दृश्य आम है।
जगराते : भगवान ने रात बनाई है सुकून से सोने के लिए। लेकिन आए दिन गली-मोहल्लों में होने वाले जगराते इसमें खलल डालते हैं। मुझे नहीं लगता दुनिया के किसी भी धार्मिक ग्रंथ में यह बात लिखी हो कि ऊंची आवाज में की गई भ तों की प्रार्थना भगवान जल्दी सुनते हैं। फिर यह शोर यों? आजकल हर गली मोहल्ले में कुछ लोगों ने अलानां-कमेटी, फलानां-कमेटी बनाकर हर साल निश्चित दिन पर जगराता कराने का ठेका ले रखा है, जिसके खर्चे वे आम जन से चंदे के रूप में वसूलते हैं। जगराता कमेटी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी के बच्चों की परीक्षा हो रही है, या आस-पास के घरों में कोई बीमार है। आधुनिक युग में भि त की यह परंपरा कम से कम मुझे तो रास नहीं आती, आपका या कहना है।
'भजनों` का शोर : सुबह तड़के चार बजे मुर्गे की बाक, घर के पास स्थित मंदिर से आती शंक की ध्वनि, मस्जिद से आजान और गुरुद्वारे के लाडस्पीकर से सुनाई देती गुरुवाणी यकीनन कर्णप्रिय होती है। नए दिन की शुरूआत को आलौकिक करने वाली ये ध्वनियां भारतीय जनमानस के हृदय में बसी हैं। लेकिन, आधुनिक युग में धार्मिक वातावरण अब वैसा नहीं रहा। आज जब एक गली में दो गुरुद्वारे तीन मंदिरों और एक मस्जिद से एक साथ ये ध्वनियां उत्पन्न होती हैं तो 'शोर` का रूप धारण कर लेती हैं, जो कतई कर्णप्रिय नहीं लगती। धर्म के विस्तार की हाे़ड में हमने गली-गली में इतने मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे खड़े कर दिए हैं कि अब वे धार्मिक स्थल कम और धर्म के नाम पर खोली गई दुकानें ज्यादा लगती हैं।
प्रसाद का 'प्रदूषण` : जैसा कि मैने पहले भी कहा, आस्था के उन्माद में हम भूल जाते हैं, हमारे द्वारा लगाए गए लंगर के बाद पीछे छूटने वाली गंदगी की ओर कोई ध्यान नहीं देता। जहां कहीं भी प्रसाद का वितरण होता है, अकसर वहां इतनी गंदगी छाे़ड दी जाती है कि अगले दिन वहां खड़ा रह कर कोई सांस भी नहीं ले सकता। यह हाल तमाम धार्मिक स्थलों का है। हम प्रसाद ग्रहण करने के बाद उसके पात्र को जहां-तहां फेंक देते हैं। इस परंपरा कोई बदलना होगा। जैसे हम अपने घरों में सफाई रखते हैं, इसी तरह सार्वजनिक स्थलों का भी हमें ध्यान रखना होगा।
अंत में, उपरो त लिखी गई बातों से मेरा आशय किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है। बल्कि मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं, धर्म के नाम पर हम ढकोसला न करें। धार्मिक ग्रंथों में लिखी बातों का अध्ययन करें और उन पर चलने का प्रयास करें। दिखावे की भि त से जीवन कभी भवसागर पार नहीं कर सकता। इतिहास गवाह है, जितने भी संत हुए हैं, उन्होंने अपने कर्मों की बदोलत मोक्ष प्राप्त किया। एक व्यवहारिक उदाहरण देना चाहूंगा। आप तय करें, किस की भि त में शि त है।
-एक आदमी किसी धार्मिक स्थल पर जाता हैं, कई घंटे लाइन में खड़े रहने के बाद उसका नंबर आता है, इसके बाद वह घर के लिए बस पकड़ता है। बस में एक वृद्धा खड़ी है, जिसे सीट नहीं मिलती। लेकिन, वह आदमी उसकी ओर से मुंह फेर लेता है और सोने का नाटक करने लगता है।
-एक आदमी कभी किसी धार्मिक स्थल पर नहीं जाता है। उसका मानना है, प्रभु घट-घट में निवास करते हैं। वह अकसर बस में बड़े बुजुर्गों और गर्भवती महिलाआें को अपनी सीट देकर घंटों खड़े होकर सफर करता है। अपने इसी तरह के कर्मों को वह अपनी पूजा मानता है।
Monday, October 20, 2008
कब तक माफी मांगते रहोगे भज्जी !
विनोद के मुसानअभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब आस्ट्रेलियाई गेंदबाज सायंमड और भज्जी विवाद एक लंबे एपिसोड के बाद खत्म हुआ। उस व त बात भारतीय संप्रभुता की थी, इसलिए पूरा देश भज्जी के साथ खड़ा था। इससे पहले भी भारतीय क्रिकेट टीम में स्थापित हो चुकेइस फिरकी गेंदबाज ने कई गलतियां की। जिनकी वे हर बार 'नादान` बनकर माफी मांग लेते हैं।
व्यवसायिक विज्ञापन फिल्मों में बाल खोलकर नाचने का मामला हो या अंतरराष्ट ्रीय फेम पर मैच के दौरान अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों से बार-बार पंगा लेने की बात, भज्जी का नाम हर बार उभरकर आया। थप्पड़ विवाद के समय लोगों ने कहा, भज्जी अब तो आपने हद कर दी। जालंधर में बैठी भज्जी की मां बोली, 'मेरा पुत्तर इंज नहीं कर सकदा`। लेकिन, टीवी स्क्रीन पर श्रीसंत के बहते आंसू सबने देखे, जो व्यथित था अपने साथी खिलाड़ी के दुर्व्यवहार से। इस एपिसोड का अंत भी भज्जी की माफी के साथ हुआ। हालांकि इसके लिए उन्हें कुछ मैचों में प्रतिबंध की सजा भी भुगतनी पड़ी। लेकिन, अब 'सीता-रावण` विवाद के बाद लगता है विवादों में रहना भज्जी की नियति बन गई है। वे सुधरकर भी सुधरना नहीं चाहते। वे हर बार ऐसी गलती कर जाते हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और फिर अगले दिन कहते हैं 'मैनूं माफ कर दो`।
गलतियां भी इनसान से ही होती हैं। हम और आप भी आए दिन कुछ न कुछ गलतियां कर गुजरते हैं। लेकिन, अगर गलती एक 'शख्सियत` करती है, तो फिर गलती के मायने बदल जाते हैं। गलती 'महा-गलती` बन जाती है। बताने की जरूरत नहींं है कि एक अंतरराष्ट ्रीय परिदृश्य का व्यि त अगर कुछ गलत कर गुजरता है तो समाज पर उसका या प्रभाव पड़ता है। भज्जी को भी यह बात समझनी चाहिए कि वे अब जालंधर के बल्टन पार्क में खेलने वाला कोई मामूली 'मुंडा` नहीं है। वह एक अंतरराष्ट ्रीय शख्सियत है, जिसकी हर बात एक अंतरराष्ट ्रीय खबर बन जाती है।
ताजा विवाद में तो भज्जी ने हद ही पार कर दी। अब वे कह रहे हैं, ऐसा उनसे अंजाने में हो गया। कोई भी कहेगा भज्जी आप 'दूध पीते बच्चे` तो नहींं हैं, जो आपसे अनजाने में हर बार गलतियां हो जाती हैं। किसी की धार्मिक भावनाआें को ठेस पहंुचाना भारत में अपराध है और आप अकसर यह अपराध कर जाते हैं।
अंत में
माफी मांग कर कोई छोटा नहीं हो जाता, अच्छी बात है, भज्जी भी इसका अनुसरण करते हैं। लेकिन, उन्हें सीख लेनी चाहिए अपने वरिष्ठ साथी सचिन तेंदुलकर से जो बुलंदियों के शिखर पर पहुंचकर आज भी स्वच्छ और सफेद चादर लिए खड़े है।
Wednesday, October 15, 2008
सादा जीवन, उच्च विचार, यही पहचान हैं उनकी
विनोद के मुसान15 अ टूबर को एक संत का जन्मदिन था। बहुत से लोगों को नहीं पता। लेकिन उनका जन्मदिन था। समाचार पत्रों में सरकार, राजनीतिक पार्टियों या किसी संस्था ने कोई विज्ञापन नहीं दिया। शायद वे आज भी जीवत हैं ! इसलिए। लेकिन वे एक सच्चे संत हैं, इसलिए उनकी तरह उनके 'भ तों` को भी इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। माफ करना, जिस शख्सियत की मैं बात कर रहा हूं, उन्हें कभी सम्मानित मदर टैरेसा या सिस्टर अल्फोंसा की तरह संत की उपाधि प्रदान नहीं की गई। लेकिन, मेरी नजरों में वे किसी संत से कम नहीं। सादा जीवन उच्च विचार, यही पहचान है उनकी। 15 अ टूबर, 1931 को रामेश्वरम में एक मछुवारे के घर एक लाल ने जन्म लिया और एक दिन वह अपने कर्मों की बदौलत देश के सर्वोच्च नागरिक बन गए।
नाम बड़ा तो दर्शन भी बड़े। मैं बात कर रहा हूं पूर्व राष्ट ्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम की। एक ऐसे आदमी की जिन्होंने भारत को विकसित राष्ट ्र बनाने का सपना देखा। सपने तो हम-तुम भी देखते हैं, लेकिन हमारे सपनों में हम अपनी उन्नति को ढूंढते हैं, लेकिन वे हमेशा विश्व कल्याण की बात करते हैं। माफ करना मुझे भी ज्ञात नहीं था कि उनका जन्मदिन है। दफ्तर में एक खबर का संपादन करते हुए पता चला की फलां-फलां स्कूल में बच्चों ने पूर्व राष्ट्रपति का ७४वां जन्मदिन 'चिल्ड्रन एनोवेशन डे` के रूप में मनाया। अपनी सामान्य जानकारी पर अफसोस हुआ, लेकिन उससे भी ज्यादा अफसोस यह देखकर कि किसी भी राजनीतिक पार्टी या संस्था द्वारा उनके जन्मदिन पर एक बधाई का प्रेस नोट तक जारी नहीं किया गया। जरा-जरा सी बात पर हो-हल्ला करने वाले ये लोग कितने अवसरवादी हैं, यह देखकर दुख हुआ। इस बात से आप भी अनभिज्ञ नहीं हैं कि इस देश में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मायावती और सत्ता में बैठे ऐसे अन्य नेताआें के जन्मदिन पर पूरे का पूरा शहर बधाई देने वाले होर्डिंग्स से पाट दिया जाता है। कुछ पूर्व संतों का जन्मदिन आज भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। अच्छी बात है। लेकिन, इन सबके पीछे निहित स्वार्थ छीपे हैं। आज कई ऐसे संत हैं, जिन्हें उनके भ तों ने सिर्फ संत नहीं रहने दिया। बल्कि उनके नाम की आड़ में कई 'संस्थाएं` खोल रखी हैं। जिनको चलाने के लिए उनका जन्मदिन मनाना भी जरूरी हो जाता है। अगर वे ऐसा नहीं करें तो कई लोगों की राजनीतिक और धार्मिक संस्थाएं बंद हो जाएंगी।
खैर इस देश में बुरा लिखने को बुराईयों की कमी नहीं। मिसाइल मैन के जन्मदिन पर मेरी और तमाम दूसरे देशवासियों की तरफ से उनको ढेर सारी बधाईयां। मैं दुआ करूंगा उनके जीवित रहते उनका सपना जरूर साकार हो, ताकी मेरी तरह इस देश के सौ कराे़ड से ज्यादा लोगों को विकसित भारत में रहने का अवसर प्राप्त हो।
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