Monday, July 20, 2009

उन्मुक्त गगन के नीचे

मानसून लेट आया है
पर एहसास नया ये लाया है,
कानून में सुधार आया है
देश में अब बदलाव आया है|
लड़के को लड़की न खोजनी
ना लड़की को लड़का,
कोई भी मिल जाये, चलेग|
बस भिडे प्रेम का टांका |
शायद अब किसी घर में
मूंछों वाली भाभी आएँगी,
कन्यायें कन्या को भी अब
जीजू जीजू बूलाएंगी|
उन्मुक्त गगन के नीचे केवल
अब जोड़े ना रास रचाएंगे,
बदल बदला होगा मंजर
लड़के जब लड़का पटायेंगे|
पुलिस के पास भी अब शायद
छेड़छाड़ के केसेज बढ़ जायेंगे,
महिला महिला को छेड़ेगी
पुरुष पुरुष से छेड़े जायेंगे |
हर सिक्के के पहलू दो होते
कुछ सुधार तो आयेंगे,
ये नए बदलाव देश को
जनसँख्या विस्फोट से बचायेंगे
NAGNDER NEGI
from
Dainik Jagran Dehra Dun

Thursday, July 9, 2009

ब्लागर मित्रों के नाम खुला पत्र

प्रिय ब्लागर मित्रों
आप सभी को मेरा नमस्कार...
खासकर श्री मृत्युंजय भाई साहब को सादर प्रणाम, जिन्होंने मुझे ब्लाग की इस अनोखी दुनिया से रू-ब-रू कराया। दफ्तर का काम खत्म करने के बाद घर लौटा तो कुछ लिखने की इच्छा हुई। सोचा आज उन दोस्तों के नाम ही एक खुला पत्र लिखा जाए, जो दूर रहते हुए भी दिल के करीब हैं। 
मैं जनता हूं, आप सब भी मेरी तरह अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हो। या यूं कहा जाए की उलझे हो। योंकि मस्ती आजकल की भाग-दाै़ड भरी जिंदगी में किसी नसीब वाले को ही नसीब होती है। फिर भी निराश होने की जरूरत नहीं है, इसी का नाम जीवन है। मैं अपने जीवन के तीस साल पूरे करने के बाद 31वें साल को अपनी तरह से इंज्वाय कर रहा हूं। जाहिर है मेरे मित्रों में भी अधिक संख्या उन लोगों की है, जो उम्र के इसी दौर से गुजर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कैरियर के लिए यही दिन जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण दिन होते हैं। मेरी तरह आप सब भी आगे बढ़ने के लिए जद् दोजहद कर रहे होंगे। 
कुछ मित्र थे जो पहले ब्लाग की दुनिया में निरंतरता बनाए हुए थे। लेकिन पिछले कुछ महिनों से वे शांत हैं। समझ सकता हूं, आप सब पहले से ज्यादा व्यस्त हो गए हो, लेकिन मुझे लगता है, समाज के उत्थान को चिट् ठाजगत को आप लोगों की जरूरत है। आप सौ कराे़ड लोगों में वह चुनिंदा लोग हैं, जिन्हें भगवान ने लेखन कार्य की शि त दी है। चिट् ठाकारों के लिखने से यूं तो यह दुनिया बदलने वाली नहीं है, लेकिन हमारा प्रयास ही हमारा प्रण है। हम जूझेंगे, लिखेंगे और चेतना की नई ज्योत को हमेशा जलाकर रखने की कोशिश करेंगे। हम शत-प्रतिशत नहीं तो दस-प्रतिशत तो कामयाब होंगे।
आदरणीय मृत्युंजय जी सबसे बड़ी शिकायत मेरी आप से है। आपके ब्लाग लेखन से ही हमें इस दुनिया में झांकने का मौका मिला। आपने हमें बुनियादी बातें भी समझाई। अब आप ही चुप बैठ गए। मैं जनता हूं अब आपके कार्यक्षेत्र का विस्तार हो गया है, बड़ी जिम्मेदारी आपकेकंधों पर हैं। लेकिन मेरा मानना है, आप अगर समय निकालेंगे तो जरूर कुछ नया पढ़ने को मिलेगा। यह मेरी ही नहीं अधिकतर ब्लागर की शिकायत है। 
वेद जी आप तो नोयडा जाकर, जैसे कहीं खो ही गए। आपकी लेखनी के हम हमेशा से कायल रहे हैं। कभी-कभार समय निकालकर कर अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज करा दिया किजिए। यही शिकायत मेरी बड़े भाई ओम प्रकाश तिवारी, रंजन जी, थपलियाल जी, भाटिया जी से भी है। लगता है जालंधर से जाने केबाद जैसे सब कहीं खो गए हैं। रजनी जी आप तो शादी के बाद से ही ब्लाग की दुनिया से गायब हैं। अब लौट आइए। बहुत दिन हुए, आपकी कोई नई कविता नहीं पढ़ी। 
...और अबरार भाई आप कहां हो, आपकी बहुत नहीं लेकिन कुछ नजमे पढ़ी, यकिन मानो बहुत दर्द है आपकी रचनाआें में। बस जरूरत है तो निरंतरता की। उम्मीद है आप जल्दी दस्तक दोगे। 
अनिल भारद्वाज जी और मनीष जी लंबे समय से आप भी कहीं दिखाई नहीं दिए। भड़ासी तो बन गए, लेकिन दिल में दबी भड़ास को कब बाहर निकालोगे। फुर्सत केक्षण निकालकर कुछ नया जरूर लिखें, ऐसा मेरा अनुरोध है। 
अंत में,
मैं अपने सभी मित्रों के सुखद भविष्य की कामना करते हुए यह चिट् ठा समाप्त कर रहा हूं। भूल-चूक केलिए माफी के साथ आपका स्नेही 
विनोद के मुसान

Tuesday, June 30, 2009

अमरत्व की अधूरी आस


विनोद के मुसान
माया की महामाया परंपार है। जो कोई न करे, वह कर गुजर जाए। पूर्व में शायद देश के महापुरूषों को अ ल नहीं थी। उन्होंने अपने जीवित रहते अपना कोई बुत नहीं लगवाया। इसलिए तो उनका यह हाल है। जो उनके अमर होने के बाद कई लोग उन्हें ठीक से जानते तक नहीं। लेकिन बहन जी ने इस मामले में कोई कसर नहीं छाे़डी। अपने जीवन रहते ही इतने बुत खड़े कर दिए, ताकि बाद में कोई कसर न रहे। फिर करे भी यों न। इतिहास गवाह है, अपने जीवत रहते अमरत्व की लालशा कई लोगों ने की। वे कितने सफल हुए, यह एक अलग विषय है। 
अब यही अभिलाषा एक दलित की बेटी ने की तो कईयों के पेट में दर्द होने लगा। अरे भाई! अमरत्व कोई सत्ता की कुर्सी नहीं, जिस पर कोई भी ऐरा-गैरा, नत्थु खैरा आ कर बैठ जाए। यह एक तपस्या है, जिसे पूरा करने के लिए कई त्याग करने पड़ते हैं। जनता के दो-चार हजार कराे़ड रुपए तो आहूति भर हैं। अपनी इस उत्थान यात्रा में वे लगातार आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने ताज कारिडोर, चल-अचल संपत्ति, भष्ट ्राचार तथा कई अन्य प्रकार के राहु-केतुआें को पटखनी देते हुए यह उपलब्धि हासिल की है। और फिर आप उनके अन्य महान कर्मों को यों भूल जाते हैं। पहले उन्होंने दलितों का उत्थान किया। उन्हें तर किया, वितर किया और फिर एकत्र किया। पिछले चुनाव में इसका विस्तार करते हुए एक उच्च श्रेणी की जाति का सेनापति नियु त किया और नारा दिया 'सर्व जन सुखाय, सर्व जन हिताय`। तुम भी खाओ, हमें भी खाने दो, सभी सुखी रहो। अब आप ही बताएं, इसमें गलत या भाई। आज कल जहां, भाई-भाई को सुखी नहीं देख सकता, वहीं वह सर्व जन सुखाय की बात करती हैं। अपने प्रदेश के दलितों का उत्थान करने के बाद वह रूकी नहीं, उन्होंने अपनी विकास यात्रा जारी रखी। वे देश की प्रधानमंत्री बनकर पूरे देश का उत्थान करना चाहती थी। लेकिन उनकी इस मुहिम को बिता चुनाव झटका दे गया। देश के कई पार्क और चौराहे उनकी अमरत्व की शिला से महरूम रह गए। 
अब ताजा प्रकरण ही ले लीजिए। अमरत्व की उनकी इस विकास यात्रा में एक सिरफिरे ने खलल डाल दिया। इतनी व्यवस्तम यात्रा में उन्हें कुछ ऐसे सवालों का जवाब देना पड़ेगा, जिनका पूछने वाले और जवाब देने वाले दोनों को पता है कि इसके बाद भी कुछ नहीं होने वाला। 
जैसे जनता की गाढ़ी पसीने की कमाई यानि सरकारी धन का दुरुपयोग यों किया गया। वह भी तब, जबकि उनका प्रदेश गरीबी और अशिक्षा में सबसे आगे है। जनता को दी जाने वाली मूलभूत सुविधाआें का टोटा है। जनता के बीच बिजली-पानी को लेकर हहाकार मचा है। स्वास्थ्य सेवाआें की तो बात ही मत करो। परिवहन का बुरा है। ऐसे में भला आप खुद का उत्थान कैसे कर सकती हैं। 
खैर हमारी तो कामना है बहन जी आप दिन-दुनी, रात चौगुनी तर की करो। आप दलितों की मसीहा बनी, खुद का उत्थान किया, अब देश का भी कुछ भला करो। योंकि ज्यादा खाने से किसी को भी अपच हो जाता है। बढ़े-बू़ढों की बात समझो। कम खाओ और सुखी रहो। 

Friday, June 5, 2009

लोकतंत्र के उत्सव में दहकते रहे पहाड़



इधर पूरी सरकारी मशीनरी लोकसभा चुनाव में व्यस्त रही और उधर उत्तराखंड के तमाम पर्वतीय क्षेत्र केवन आग की चपेट में थे। पहाड़ों में सुलगती ज्वालाएं रोज अपार वन संपदा को लीलती रहीं, लेकिन आग को बुझाने की पहल नहीं की गई। चुनाव तो सकुशल निपट गया। लेकिन इस दौरान जलते जंगलों के बाद हुई क्षति को कौन पूरा करेगा, यह प्रश्न्न यक्ष बना हुआ है।  
विनोद के मुसान
पहाड़ गर्म हैं। देश भी गर्म है। वजह अलहदा है। देश में सियासी लू चल रही है तो पहाड़ों में आग पखवाड़े भर अपना दायरा बढ़ाती रही। इसका अहसास वहां सैर को जाने वालों को होता है जब दिन में कपड़ों पर गर्द पड़ती है और रात केअंधेरे में आसमान लाल लगता है। देखने में खूबसूरत लगने वाले रात के आसमान की हकीकत जानने केबाद जेहनी जु़डाव वाले लोग शायद ही उस रात सो पाएं। कहां गए होंगे वहां के जानवर? कितने पे़ड, कितने घोसले खाक हुए होंगे? आयोग की सख्ती से लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव में जनता को राहत मिली, लेकिन यहां राहत कहां? इतने छोटे से लफ्ज की इतनी बड़ी तासीर, कि कल्पना में रात गुजर जाए। 
होश संभलने के दौरान आपने भी कहानी पढ़ी होगी जिसमें कोर्ट में पेश एक नासमझ वकीलों के तमाम तर्कों के बावजूद नहीं मान पाता कि दो बोल्ट खोलने से ट्रेन भला कैसे पलट सकती है। उसने तो मछली पकड़ने के जाल में बांधने केलिए रेल पटरी से दो नट-बोल्ट खोले थे। ऐसा तो उसके बस्ती वाले अ सर करते थे। उसे सजा मिलती तो है लेकिन अपराध को वह समझ ही नहीं पाता। ठीक उसी तरह जब उत्तराखंड के बाशिंदों से जाना कि हर साल लगती है आग, लेकिन इस बार लगाने वाले ने यह सोचा भी नहीं होगा कि बुझाने वाले ही नहीं मिल पाएंगे। 
उत्तराखंड में रात को सफर करते समय ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से उठने वाली लपटें किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती हैं, लेकिन काल की माफिक अपार वन संपदा और वन्य जीवन को लीलने वाली इन लपटों की हकीकत जानने के बाद किसी का भी मन उद् विगन हो सकता है। तपती गरमी में दिन के समय जलते जंगलों से उठने वाला धुआं और हवा के साथ गिरने वाली राख पूरे वातावरण को दूूषित बना देती है। 
देवभूमि कहे जाने वाले इस छोटे से प्रदेश की वन संपदा खतरे में हैं। खतरा इतना बड़ा है कि इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। पूरे प्रदेश के जंगल इन दिनों आग की चपेट में हैं। हर तरफ बस आग की लपटें दिखाई देती हैं। शासन और प्रशासनिक मशीनरी को सबकुछ दिखाई दे रहा था, लेकिन वह पहले लोकतंत्र के महाकुंभ में व्यस्त थी और अब खुमारी उतारने में। आम आदमी दुनियादारी के झंझटों में इतना उलझा है कि वह इन दृश्यों को देखकर भी अनदेखा कर देता है। 
पिछले दिनों एक शादी समारोह में टिहरी गढ़वाल जाते हुए तपते पहाड़ों को देखकर मन में एक अजीब सी उदासी छा गई। लगा मेरे सामने मेरा घर जल रहा है और मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं। थक-हार कर आपातकालिन सेवा नंबर पर फोन किया। एक नहीं कई बार फोन किया। हर बार एक ही जवाब आया। हमने आपकी शिकायत दर्ज कर ली है। फलां थाने को इसकी सूचना दे दी गई है। संबंधित अधिकारियों का नंबर मांगने पर पहले तो असमर्थता जता दी गई। बाद में नंबर उपलब्ध हुआ तो जवाब मिला, साहब इन दिनों चुनाव में व्यस्त हैं, कुछ नहीं कर सकते। मन खिन्न हो गया। वन विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो टका का जवाब मिला, 'हम कोशिश कर रहे हैं।` 
यह वही विभाग है, जो किसी ग्रामीण को एक गट्ठर चूल्हे की लकड़ी ले जाते पकड़ ले तो उस पर अच्छा-खासा जुर्माना कर देता है। पर यहां तो पूरे के पूरे जंगल खाक हो रहे हैं। तमाम पशु-पक्षी मारे-मारे फिर रहे हैं। वनाषौधियां नष्ट हो रही हैं। भूमि में जल संरक्षित करते वाले श्रोत खत्म हो रहे हैं। पूरी प्रकृति ही अपना श्रंगार खो रही है। 
टिहरी जिले की भिलंगना रेंज, भागीरथी रेंज, पोखाल, जगधार, चंबा केवन, सुरसिंहधार, प्रतापनगर, बाल गंगा रेंज, नैलचामी डाडां, घनसाली ब्लाक, देवप्रयाग और श्रीनगर के बीच में पड़ने वाले तमाम जंगल, नई टिहरी के आस-पास केवन, पटीयाली गांव केसामने की पहाड़ियां कुछ ऐसी जगह थीं, जो आग की लपटों में घिरी थी। 
यह वही जिला है, जहां से अभी कुछ दिन पहले पर्यावरण केनाम पर एक शख्स राष्ट ्रीय सम्मान पद् मविभूषण लेकर लौटे हैं। मैं बात कर रहा हूं उस जानी-मानी हस्ती की, जिसे लोग अंतर्राष्ट ्रीय ख्याति प्राप्त शख्सियत सुंदर लाल बहुगुणा के नाम से जानते हैं। मन में एक सवाल उठा, 'बहुगुणा जी, आप तो नई टिहरी में निवास करते हैं, जहां से दूर-दूर तक हिमालय केदर्शन होते हैं, दिन नहीं तो रात में तो आपको जलते जंगलों से उठती लपटे जरूर दिखाई देती होंगी, आप कुछ करते यों नहीं?` 'अगर ये पहाड़ यूं ही तपते रहे, कहां रहेगा पर्यावरण और कहां जाएंगे पर्यावरणविद् ?`
यहां निवास करने वाले आम आदमी से इस विषय में बात करने पर सौ में से नब्बे लोगों का एक ही जवाब होता है, 'जंगलात वाले जंगलों में खुद आग लगाते हैं।` कारण पूछने पर बताते हैं, इसके बाद होने वाली मोटी कमाई, जो उन्हें ऐसा करने के लिए उकसाती है। जलते जंगलों की आग शांत करने के लिए जारी होने वाला मोटा बजट और इसके बाद प्लानटेशन के नाम पर होने वाली खानापूर्ति से छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े अधिकारी तक अपना पेट भरते हैं।` हकीकत कुछ भी हो, लेकर इस स्याह सच को झुठलाया नहीं जा सकता कि जंगल जल रहे हैं और धुआं वहीं उठता है, जहां आग लगी हो। 
ऐसा नहीं है कि इस आपदा को लेकर पहाड़ का हर शख्स मौन हो, कुछ ऐसे कर्मठ लोग भी यहां मौजूद हैं, जिन्होंने गांव केआस-पास केजंगलों में आग को कभी फटकने भी नहीं दिया। उन्होंने इन जंगलों को अपने बच्चे की तरह पाला है। टिहरी जिले के हिंडोलाखाल ब्लाक में मां चंद्रबदनी देवी मंदिर केनीचे निवास करने वाले कई गांव ऐसे हैं, जो इस मुहिम को जनांदोलन का रूप दिए हैं। कैंथोली, करास, पुजार गांव और आस-पास के कुछ अन्य गांव इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। आस-पास आग की एक छोटी सी चिंगारी पर भी पूरे गांव के लोग इकट् ठा होकर उसे शांत कर देते हैं। इन गांवों केआस-पास फैले घने बांज और चीड़ के जंगल खुद इनकी रक्षा करने वालों के हौसले की दाद देते हैं। 
यहां के लोगों का मानना है, 'ये सिर्फ जंगल नहीं, हमारे माता-पिता हैं, जो हमें अपनी गोद में पालते हैं, जिस दिन इनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, ये पहाड़ भी रहने लायक नहीं रहेंगे। अगर व त रहते लोग नहीं चेते तो पहाड़ बिन जंगल ठीक उस विधवा की तरह दिखेंगे, जिसकेमाथे का सिंदूर मिट चुका होता है।`

नोट - यह लेख 24 मई को 'कांपे ट` (अमर उजाला संस्करण) में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है। 

Sunday, May 10, 2009

चुनाव सभा में फिल्मी सितारे

विनोद के मुसान
भारतीय राजनीति में नेताआें की छवी जनता के बीच कितनी दूषित हो चुकी है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण लोकसभा चुनाव में साफ देखने को मिल रहा है। वे भीड़ को देखने के लिए तरस रहे हैं, लेकिन जनता उन्हें घास नहीं डाल रही। थक-हारकर उन्हें वह हत्थकंठे अपनाने पड़ रहे है, जो मर्यादित राजनीति को शोभा नहीं देते। स्टार प्रचारकों के नाम पर चुनावी सभाआें में उन लोगों को प्रस्तुत किया जा रहा है, जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। फिल्मी पर्दे पर अभिनय कर एक हद तक भीड़ खिंचने वाले फिल्मी सितारे अब राजनीतिक मंचों की शोभा बनने लगे हैं। यहां भी यह लोग एक हद तक भीड़ खिंच लेते हैं, जिसको हमारे राजनेता अपनी उपलब्धि समझने की भूल कर रहे हैं। 
दरअसल फिल्म पर्दे की चकाचौंध के बाद जब फिल्म सितारे यकायक पब्लिक से रूबरू होते हैं, तो भीड़ भी उमड़ पड़ती है, यह वह भीड़ होती है, जो अपने चहेतों स्टार को करीब से देखने आती है। न की इन्हें बुलाने वाले नेता को। यही वजह है कि चुनावी रैलियों जनता के मुद् दे गौण हो रहे हैं। सभा से बाहर निकलने के बाद लोग बात करते हैं कि फंला अभिनेत्री ने या पहना था, वह बार-बार अपने बालों को झटके दे रही थी। अरे, उस अभिनेता की तो जींस फटी थी, फटी थी...नहीं-नहीं, यह तो फैशन है। नेता जी ने अपने भाषण में या कहा, या नहीं कहा। इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं। भीड़ पहुंच गई। दिल्ली से आए बड़े नेता जी भी खुश। लेकिन यह हत्थकंडा भी ज्यादा दिन नहीं चलेगा। एक समय के बाद भीड़ नेताआें की तरह फिल्मी लोगों को भी नहीं पूछेगी। 
हालांकि चुनाव आयोग की सख्ती के चलते चुनावी सभाआें के मंच पर इस बार भाै़ंडे डांस नहीं दिखाई दिए। जिनको लेकर चुनाव चर्चाआें का विषय बनता था। उत्तर प्रदेश और बिहार में तो यह आम बात थी। पब्लिक को रिझाने के लिए नेता लोग जो न कर जाएं, वह कम है।  
आफ बीट लोग कहते हैं, फिल्म वाले पैसा लेकर प्रचार करने आते हैं, इसमें भी दोराय नहीं है, योंकि इसी चुनाव में कुछ फिल्मी सितारों को एक दिन एक पार्टी तो दूसरे दिन दूसरी विपक्षी पार्टी का प्रचार करते देखा गया। टीवी चैनलों पर भी खूब शोर मचा। दोस्तीऱ्यारी और रिश्ते निभाने तक तो ठीक है, लेकिन पैसा लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था केलिए चुने जाने वाले सदस्यों के लिए प्रचार करना शोभा नहीं देता।
एक समय था जब चुनावी मंचों पर देश की नई तस्वीर तय होती थी। बड़े-बड़े मुद् दों पर बहस होती थी। शालिन अंदाज में विपक्ष की धज्जियां भी उड़ाई जाती थी। लोग दूर-दूर से नेताआें को सुनने आते थे। सभा से बाहर निकलने के बाद लोग आपस में बहस करते थे। लेकिन वर्तमान राजनीति का चेहरा इस कदर विकृत हो चुका है कि इसमें इन बातों के लिए कोई जगह नहीं है।  

Saturday, May 2, 2009

मुद् दों का सौदागर

विनोद के मुसान

नेता जी के आराम में खलल डालते हुए उनके सेके्रटरी चमच्च लाल ने तेजी से कमरे में प्रवेश किया और बोले, 'सर हमारी कान्सीटेंसी में 'मुद् दों` का सौदागर घूम रहा है।` 'कहो, तो बुला लाऊं।` 'पिछले चुनाव के बाद अबकी बड़ी मुद् दत के बाद दिखाई दिया है। कहीं ऐसा न हो, पिछली बार की तरह इस बार भी विपक्षी दल के लोग उसे लपक ले जाएं और हमारे हाथ इस बार भी खाली रह जाएं।` 'वैसे पिछली बार तो जुगाड़ से काम चल गया था, लेकिन इस बार या होगा।` नेता जी ने बड़ी सी जमाही ली और बोले, 'कौन-कौन से मुद् दे हैं इस बार सौदागर की झोली में।` 'महाराज, वो तो उसे बुलाने पर ही पता चलेगा।` 

'कहो तो, बुला लाऊं`। 'हां,` 'लेकिन रूको।` 'पहले इस बात की तफ्तीश कर लो, या इस बार मुद् दों की जरूरत है भी या नहीं।` 'जहां तक मेरी जानकारी है इस बार बड़ी-बड़ी पार्टियां भी बिन मुद् दई चुनाव लड़ रही हैं।` 'कहीं ऐसा न हो उसे बुलाकर हम बेकार का खर्च सिर मोल ले लें।` 'चुनाव आयोग का या भरोसा इसे भी हमारे चुनाव खर्च में ही जाे़ड लेगा।` 'फिर भला उसके पास इस बार कौन से नए मुद् दे होंगे। दशकों पहले हमने जो मुद् दे चुनाव के व त जनता के बीच रखे थे, वह आज भी वैसे ही हैं।` 'हर बार गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, आतंकवाद और जनता को बरगलाने वाली कुछ नई योजनाएं इस बार भी चला देंगे। वैसे भी जनता के बीच अब ये मुद् दे बाजार में खोटा सि का चलाने जैसी बात है।`
 'जनता के पास ही इन बातों के लिए समय नहीं, तो भला हम यों मथापच्ची करें।` 
 'लोकतंत्र का यह महापर्व अब रस्मी अनुष्ठ ान बन गया है। जिसे पूरा करने के लिए अगर मुद् दों के सौदागर के पास कोई बूटी हो तो जरूर उसे बुला भेजो।` 'वैसे भी आतंकवाद पर एक पार्टी का कब्जा है, दूसरी परमाणु करार को लेकर चिंतित है, तीसरे हॉट मुद् दे का मुद् दा भी तीसरे र्मोचे ने लपक लिया है।` 
'मंदी को लेकर हम जनता के बीच जाना नहीं चाहते, योंकि यही असली मुद् दा है।` 'अगर गए तो कल जवाब देना पड़ेगा। इसलिए मुद् दों की बात न ही करो, तो ज्यादा अच्छा है। वैसे तो जनता की याददाशत बहुत कमजोर होती है, लेकिन बात जब सतही मुद् दों की आती है तो कोई भी 'जवाब हाजिर` हो सकता है।`
'जनता को मुद् दों की याद दिलाकर, अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसी बात होगी। इसलिए अच्छा यही होगा, मुद् दों केसौदागर को न ही बुलाओ।` 'आगे काम की बात सोचो।` 'चुनाव जीतने के बाद किस पार्टी की गोद में बैठें और अभी किस की यारी प्यारी है।` 
नेता जी के तर्क सुनकर सके्रटी भी सोचने लगा, जब मुदई ही मुस्तैद नहीं है, तो भला चम्मच लाल यों अपनी चम्मची चमकाए। 

Saturday, March 28, 2009

टीवी पर न्यूज का टोटा

विनोद के मुसान
टीवी न्यूज चैनल की स्क्रीन से खबरें सिरे से गायब हैं। अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने वाले तमाम न्यूज चैनलों के पास खबरों का ऐसा टोटा है कि वे हांफते फिर रहे हैं। फिर भी प्रतिस्प्रर्धा की अंधी दाै़ड में बेशर्म होकर अपने को सर्वश्रेष्ठ कहलाने से नहीं हिचकते हैं।  
लोग सुबह उठते हैं, ताजातरीन होकर। टीवी का स्विच ऑन करते हैं, यह सोचकर की देश दुनिया की खबरों से रू-ब-रू हो सकें। लेकिन, इससे इतर उन्हें जानकारी मिलती है, बीती रात कौन से सीरियल में या घटित हुआ। नच बलिए में किस ने कौन से लटके-झटके दिखाए और हंसी के फूहड़ शो में पूरा शो खत्म हो जाने केबाद भी किसी को हंसी नहीं आई। छोटे उस्ताद में गंगू बाई ने किसके घर में झाड़ू लगाई। कौन से हिरो-हिरोइन ने इन दिनों किस कंपनी का प्रोड ट लांच किया। और इस सबकेबाद भी टाइम बचा तो आपको इसी लोक में पाताल लोक की सैर भी करा दी जाती है। जब दिखाने को कुछ न हो तो सदाबहार 'आतंकवाद` तो है ही। यह ऐसा विषय है, जिसके कभी भी चला दो। एजेंसी से उठाई हुई ि लप को मिर्च-मसाला लगाकर ऐसे पेश किया जाता है, जैसे दुनिया की सबसे बड़ी खबर आज चैनल के हाथ लग गई हो। खबरों के नाम पर जो भाै़ंडा खेल चैनल वाले खेल रहे हैं, इसने रही-सही पत्रकारिता का भी सत्यानाश कर दिया है। चैलनों पर चलने वाली खबरों को देखकर कोफ्त होती है, सिर दर्द करने लगता है। आम शख्स आज न्यूज चैनलों केबारे में अपनी बेबाक रखता है तो उसकेमुख से कभी अच्छी बात नहींं निकलती। वैसे भी पत्रकारिता के इस पवित्र पेशे में कैसे-कैसे लोगों की गुसपैठ हो चुकी है, यह बात किसी से छुपी नहीं है। 
ईमानदारी से सोचो सौ कराे़ड से ज्यादा आबादी वाले इस देश में या बारह घंटे की खबरें नहीं जुटाई जा सकती। चलो मान लिया आप चौबीस घंटे केन्यूज चैनल हैं, आपको हर व त कुछ न कुछ दिखाना है। लेकिन खबरों केनाम पर जो कुछ दिखाया जा रहा है, या वह उचित है। बासी ही सही लेकिन खबरें तो दिखाओ। चैनल वालों को लग रहा है, लोगों को फूहड़ हंसी वाले शो दिखाकर वे भी वे अपनी टीआरपी बढ़ा रहे, लेकिन ऐसा कब तक चलेगा।  

Tuesday, March 17, 2009

लल्लन टॉप चैनल

अशोक मिश्र
शाम को थका-मांदा घर पहुंचकर टीवी ऑन किया। चैनल 'लल्लन टॉप` पर खबरें प्रसारित हो रही थीं। समाचार वाचिका भानुमती की सुरीली आवाज गूंज रही थी, 'लल्लन टॉप` की खास पेशकश...दौलतपुर के एक गांव में गाय ने एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया,...दौलतपुर की धरती ने आज उस समय इतिहास रच दिया, जब दौलतपुर के एक गांव रमईपुरवा में एक गाय ने तीन बछियों को एक साथ जन्म दिया। तीनों बछिया स्वस्थ हैं। उनकी देखभाल जिला मुख्यालय से आई डॉ टरों की एक टीम कर रही है। कैमरामैन के साथ हमारे संवाददाता चंद्रबख्श मौके पर पहुंच चुके हैं। हम आपको फिर याद दिला दें कि दौलतपुर के गांव रमईपुरवा में बलिराम की गाय कबरी ने एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया है...आइए, हम अपने संवाददाता चंद्रबख्श जी से पूछते हैं कि वहां का या माहौल है?`
स्क्रीन पर माइक संभाले चंद्रबख्श जी नजर आते हैं। भानुमती कहती है, 'चंद्रबख्श जी, आप हमारे दर्शकों को बताएं कि वहां का या माहौल है? तीन बछियों को जन्म देने के बाद गाय कैसा महसूस कर रही है?` 
चंद्रबख्श समाचार आगे बढ़ाते हैं, 'भानुमती, दौलतपुर के लोग सुबह से ही पटाखे फाड रहे हैं। गाय भी काफी खुश है। आप देख सकते हैं कि गाय इस समय हरा चारा खा रही है। उसके चेहरे पर प्रसन्नता और गर्व की झलक साफ देखी जा सकती है। उसने दौलतपुर के इतिहास में एक सुनहरा पन्ना जो जाेडा है। आइए, बात करते हैं गाय के मालिक बलिराम जी से।,`
स्क्रीन पर झ कास कुर्ता-पायजामा पहने बलिराम के साथ चंद्रबख्श प्रकट होते हैं। चंद्रबख्श पूछते हैं, 'बलिराम जी, या आपको पहले से उम्मीद थी कि आपकी गाय तीन बछियों को जन्म देगी?` बलिराम जी मंूछों पर ताव देते हुए कहते हैं, 'तीस साल पहले कबरी की दादी ने भी एक साथ तीन बछियों को जन्म दिया था। इसकी मां भूरी ने भी दो बछड़ों को जन्म दिया था। हमें पूरी आशा थी कि यह भी कोई उपलब्धि जरूर हासिल करेगी।`
इसके बाद कैमरा बलिराम के चेहरे से पैन होता हुआ कबरी तक जाता है। कुछ देर तक चारा खाती कबरी और गांव में नाचती-गाती भीड़ को दिखाकर चंद्रबख्श विदा हो जाते हैं। स्क्रीन पर भानुमती का चेहरा नमूदार होता है। वह कहती हैं, 'हम अपने दर्शकों को ले चलते हैं दिल्ली स्टूडियो, जहां मौजूद हैं प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एमएनए सुब्रमण्यम राधास्वामी जी। चलिए, उनसे पूछते हैं कि इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर या प्रभाव पड़ेगा?` राधास्वामी पहले खखारकर गला साफ करते हैं, फिर बोलते हैं, 'मैं समझता हूं कि इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। हां, बलिराम की विकास दर देश के विकास दर से थाे़डा ज्यादा रहेगी।` भानुमती एक बे्रक लेकर स्क्रीन से गायब हो जाती है। मैं भी टीवी बंद कर चादर आे़ढकर सो जाता हूं। 
(अशोक जी का यह लेख 'अमर उजाला` 16 मार्च, 2009 के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है।)
साभार-अमर उजाला 

Sunday, March 15, 2009

राजनीति में एंट्री


विनोद के मुसान
रामजी भाई गांव वाले इन दिनों काफी परेशान हैं। यूं तो उनकी परेशानी की वजह कुछ खास नहीं, लेकिन समस्या देशहित के साथ उनके कैरियर से जुडी है। व्यवस्था में रामजी भाई का योगदान मात्र इतना है कि वर्ष दर वर्ष किसी न किसी चुनाव में वे अपना कीमती मत 'दान` कर देते हैं। यूं तो उनका यह दान बहुत बड़ा है, लेकिन उन्हें लगता है मात्र दान कर लेने भर से उनकी और देश की समस्याएं हल होने वाली नहीं हैं। इसलिए पिछले दिनों उन्हें कुछ नया करने की सुझी और उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाने का निर्णय ले लिया। 
आम आदमी का लेबल लिए रामजी भाई भले ही 'आम` हों, लेकिन उनमें वह सारी काबिलियत मौजूद हैं, जो उन्हें आम से खास बना सकती हैं। लेकिन व्यवस्था से अपरिचित जब उनका सामना सच्चाई से हुआ तो सारी की सारी योजनाएं धरी रह गइंर्।
रामजी भाई चाहते थे कि वे जनता की बीच जाकर देश की सर्वोच्च संस्था से जुड देशहित में योगदान दें। लेकिन, यहां पर आकार वे फंस जाते हैं। 
उनके पास राजनीति में आने के लिए न तो किसी फिल्मीस्तान यूनिर्वसिटी की डिग्री है और न वे गुल्ली-डंडा केअलावा कभी क्रिकेटिया रंग में रंग पाए। गांव में रहते हुए उन्हें भाईगिरी करने का भी मौका नहीं मिला। बस नाम के ही 'रामजी भाई` बनकर रह गए। अब भला देश की समस्याएं हल कैसे हों, यही चिंता उन्हें आजकल दिन रात खाए जा रही है। इन दिनों रामजी भाई अपने गैर राजनीतिक खानदान को कोसने से भी बाज नहीं आते। दादा-नाना, चाचा-ताऊ, मामा-फूफा कोई तो होता, जो भवंर फंसी उनकी नैया का इस व त खेवनहार बनता। राजनीति केमैदान में उनका खानदान हमेशा से 'सफाच्चट` ही रहा। जिसका उन्हें इस दिनों खासा दुख है। 
आर्थिक तंगी से जूझ रहे रामजी भाई की बीते दिनों की गई समाज सेवा भी काम नहीं आ रही। बुरे कर्मों की बाढ़ में लोग अच्छे काम करने वाले को किस कदर भूल जाते है, इसका अहसास रामजी भाई को इन दिनों खूब हो रहा है। वोट बैंक की राजनीति का आधुनिक 'विकृत` चेहरा देख वे हैरान हैं। टिकट से पहले नोट, जातिगत समीकरण और सेलिब्रिटी लेबल के अलावा तमाम दूसरे दाव-पेचों से उनकी झोली बिल्कुल खाली है। आमोखास बनने का कोई भी रास्ता उन्हें दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में उनकी चिंता लाजिमी है। 
आखिर उनकी जुगत उनके साथ देशहित से जु़डी है। रामजी भाई बड़ा सोचते लेकिन बौनी व्यवस्था के आगे उनके कदम लड़खड़ाने लगते हैं। आखिर, हैं तो वह आम आदमी ही। जिसका कोई पूछनहार नहीं होता। कई तरह की जुगत लगाने के बाद भी जब रामजी भाई को कोई प्लेटफार्म नहीं मिल रहा तो वे अब इस क्षेत्र में आने से पूर्व अलविदा कहने की तैयारी कर रहे हैं।

Tuesday, November 18, 2008

Extra Spinner for 3rd ODI?

Yuvraj Singh smashed back-to-back centuries to help India take a 2-0 lead after the first two matches in the seven-match ODI series against England on Monday. While England's bowlers had no answer to Yuvraj's brilliance, their batsmen came a cropper in both matches against the Indian bowlers.
With India sitting pretty, and the Kanpur pitch, the venue for the third ODI, expected to assist spinners, should Pragyan Ojha replace left-armer R P Singh, who has so far looked quite rusty? Or should India retain the winning combination for Thursday's match and not allow England a chance to stage a comeback?
What should the playing eleven for the third ODI be? Be the selector, pick your eleven.

Mahendra Singh Dhoni (captain), virender Sehwag, Yuvraj Singh, Gautam Gambhir, Suresh Raina, Rohit Sharma, Virat Kohli, Yusuf Pathan, Murali Vijay, Harbhajan Singh, Zaheer Khan, Munaf Patel, Ishant Sharma, R P Singh, Pragyan Ojha.